कानपुर आने पर नेताजी और श्याम दद्दा एक रिक्शे में बैठकर शहर घूमकर हालचाल लेते थे और एक साथ बैठकर खाना खाते थे।
कानपुर। मुलायम सिंह काे नाम धरती पुत्र और भूमि पुत्र का नाम कानपुर में मिला था। यह नाम देने वाले कोई और नहीं उनके जिगरी दोस्त पूर्व विधायक श्याम मिश्र थे। उनके निधन पर मुख्यमंत्री रहते हुए मुलायम दौड़े चले आए थे।
पूर्व विधायक श्याम मिश्र के भाई नरेश मिश्र बताते है कि भइयो की नेताजी से घनिष्ठ मित्रता थी। कानपुर आने पर नेताजी और श्याम दद्दा एक रिक्शे में बैठकर शहर घूमकर हालचाल लेते थे और एक साथ बैठकर खाना खाते थे। नेताजी जब भी कानपुर आते तो श्याम दद्दा से जरूर मिलते थे। जनवरी 2007 में भइया श्याम मिश्र की मृत्यु हो गई, उस वक्त मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।
जानकारी मिलते ही प्रोटोकाल तोड़कर शहर के लिए रवाना हुए। नेताजी के आने की जानकारी मिलने पर प्रशासनिक अफसरों में खलबली मच गई और सीघे धनकुट्टी घर पहुंच गए। तत्कालीन मंडलायुक्त अनिता भटनागर जैन ने कहा कि मुख्यमंत्री सीढ़ियां कैसे चढ़ेंगे। इसपर उनको बताया गया कि कई बार इन्हीं सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर आ चुके हैं, यहां आने पर वह करीब एक घंटे तक परिवार के साथ रहे थे।
सरकार बनते ही पूरी की थी व्यापारियों की मांग
सपा के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र मोहन अग्रवाल बताते हैं कि वो नेता जी से 30 साल से जुड़े थे और बड़े-छोटे भाई जैसे संबंध थे। पहली बार 25 जुलाई 1993 में लाजपत भवन में व्यापारियों के सम्मेलन में नेताजी ने कहा था कि जैसे ही सरकार बनेगी सभी समस्याएं निस्तारित होंगी। उनकी बातों टेप कर ली थीं और सरकार बनते ही सबसे पहले नेताजी ने आवश्यक वस्तु अधिनियम को समाप्त कर दिया था।
पूर्व कानपुर देहात सपा जिलाध्यक्ष वीर सेन यादव बताते हैं कि वर्ष 2001 में पुखरायां के बेलाही बाजार में समाजवादी पार्टी की रैली का संचालन किया था।
कानपुर। सपा सरकार में उनकी प्रदेश की राजनीति कि दिशा और दशा कानपुर के रहने वाले उनके मित्र और सपा सरकार में मिनी सीएम कहलाने वाले चौधरी हरमोहन सिंह की कोठी से चलती थी. मुलायम सिंह यादव अक्सर कानपुर के मेहरबान सिंह पुरवा स्थित चौधरी हरमोहन की कोठी पर आते थे.
इसलिए अहम थे मुलायम के लिए हरमोहन
चौधरी हरमोहन सिंह यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं. तीन बार एमएलसी रहे हरमोहन को सपा ने दो बार राज्यसभा भी भेजा था. जब मुलायम सिंह यादव पहली बार सीएम बने तो हरमोहन का इतना रसूख था कि लोग उन्हें 'मिनी सीएम' कहते थे. संगठन और सरकार के फैसलों की जमीन अक्सर उनकी कोठी पर तैयार होती थी. मुलायम सिंह यादव ने जब 60 के दशक में पहला चुनाव लड़ा था तो यादव महासभा के जरिए हरमोहन के भाई रामगोपाल ने उनकी काफी मदद की थी. इस चुनाव से दोनों परिवारों के रिश्ते प्रगाढ़ हो गए. रामगोपाल 1977 में बिल्हौर लोकसभा सीट से सांसद भी रहे थे. रामगोपाल के निधन के बाद हरमोहन सिंह ने यादव महासभा के संचालन का जिम्मा संभाला था.
मेहरबान सिंह पुरवा का मॉडल सैफई में अपनाया
मुलायम सिंह यादव अपने हर कार्यकाल में कानपुर और मेहरबान सिंह का पुरवा आना नहीं भूलते थे. मुलायम सिंह यादव ने मेहरबान सिंह का पुरवा से ही सैफई के विकास की तस्वीर खींची थी. जब मुलायम सिंह यादव ने देखा कि हरमोहन सिंह अपने गांव में इतना विकास करा रहे हैं तो उन्होंने भी इस मॉडल को सैफई में अपनाया था. सीएम बनते ही मुलायम सिंह यादव ने मेहरबान सिंह का पुरवा की तरह सैफई में भी नाली, सड़कों का निर्माण कार्य और सौंदर्यीकरण कराया था.


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