वीएसएसडी कॉलेज के समारोह में शामिल हुए मोहन भागवत, बोले- शिक्षा सुसंस्कृत करने वाली हो।
कानपुर। विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म कॉलेज के शताब्दी समारोह की श्रंखला में पूर्व गुरु वंदन एवं पूर्व छात्र अभिनंदन समारोह का आयोजन संस्थान में हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ डॉ. मोहनराव भागवत मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान 40 पूर्व छात्रों और 60 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले में कई ऐसे छात्र भी रहे जो पहले कॉलेज के छात्र, फिर शिक्षक और प्राचार्य बनकर रिटायर हुआ। इस दौरान देश भर से पूर्व छात्र शामिल हुए। पूर्व शिक्षकों और छात्रों से मिलकर यादें ताजा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्रीब्रह्मावर्त सनातन धम महामंडल के अध्यक्ष और वीएसएसडी कॉलेज के सचिव वीरेंद्र जीत सिंह ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में सीएसजेएमयू के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक मौजूद रहे।कार्यक्रम के दौरान 40 साल से एक ही पद से रिटायर हुए शिक्षक आए तो कई पूर्व छात्रों ने अपने गुरुजनों को देख पुराने दिनों की याद की। 95 साल के शिक्षक कैलाश नाथ गौड़ हिंदी विभाग में शिक्षक थे, वह अपने बेटे और कॉलेज के पूर्व छात्र सनी गौड़ के साथ आए। कैलाश नाथ पूरी तरह से व्हीलचेयर पर थे, लेकिन उनका उत्साह किसी से कम नहीं रहा।वीरेंद्रजीत सिंह ने शिक्षकों एवं पूर्व छात्रों का आभार किया। इस दौरान प्राचार्य डॉ. विपिन कौशिक, प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष डॉ. केके गुप्ता, प्रबंध समिति की संयुक्त मंत्री नीतू सिंह, अध्यक्ष प्रबंध समिति आदित्य शंकर बाजपेई, सह सचिव प्रबंध समिति सुरेंद्र कक्कड़, नवदोय विद्यालय समिति के सदस्य अनिल कुमार गुप्ता मौजूद रहे। शिक्षा ऐसी जो छात्र के अंत:करण में छिपी प्रतिभा को निखारे
संघसंचालक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा का पहला उद्देश्य छात्रों के अंत:करण में छिपी प्रतिभा को बाहर लाना होना चाहिए। शिक्षा सुसंस्कृत करने वाली हो। ज्ञान का उपयोग कैसे करना है और कब करना है यह अनुभव विकसित करने की आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि संस्कारवान बनने के लिए अपने निकट के लोगों आदर्श बनाएं। बेहतर हो अपने गुरु को आदर्शमान संस्कार ग्रहण करें। हम जैसे हैं उसके पीछे जाएंगे तो उन्नति मिलेगी और हम जैसे नहीं हैं उसके पीछे जाएंगे तो उन्नति कदापि नहीं मिलेगी।डॉ. भागवत ने कहा कि अंग्रेजी बोलना अच्छी बात है, लेकिन मातृभाषा न भूलें। स्कूलों में यूनिफार्म धोती न हो कोई बात नहीं, लेकिन घर में किसी शुभ अवसर पर धोती पहननी हो और यह न आए यह गलत है। उन्होंने कहा कि ऐसे विद्यालयों की संख्या बढ़े जो मूल्यों को अधिक महत्व दे। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को यही सुसंस्कृति, मानवीय मूल्य, आवरण और व्यवहार सिखा रही है। शिक्षा में जो भी ज्ञान दिया जाता है, वह शिक्षा और अनुभव से मिलता है। पढ़ना लिखना जरूरी है, लेकिन कई अल्प शिक्षित लोग खुद सक्ष्म हुए और दूसरों को भी मजबूत किया। डॉ.भागवत ने अमेरिका के करोड़पति का किस्सा सुनाया कि कैसे चर्च में घंटी बजाने वाला शख्स कैसे अपने विचारों, अनुभव से करोड़पति बना। छात्र को संस्कारवान बनाने वाले स्कूलों को बढ़ाएं। स्कूलों में शिक्षा के साथ संस्कार मिलना बेहद जरूरी।



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