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14/09/2020

भारत तीसरा मुख्य सरसों उत्पादक एवं सातवा सरसों के तेल का निर्यातक देश



  • राष्ट्रीय कृषि अर्थव्यवस्था में तिलहनी फसलों का द्वितीय स्थान है। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर कनाडा और चीन के बाद भारत तीसरा मुख्य सरसों उत्पादक एवं सातवा सरसों के तेल का निर्यातक देश है


कानपुर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ महक सिंह ने बताया कि राई सरसों महत्वपूर्ण फसल है। उन्होंने बताया की राष्ट्रीय कृषि अर्थव्यवस्था में तिलहनी फसलों का द्वितीय स्थान है। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर कनाडा और चीन के बाद भारत तीसरा मुख्य सरसों उत्पादक एवं सातवा सरसों के तेल का निर्यातक देश है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2018-19 में राई सरसों का कुल क्षेत्रफल 7.53 लाख हेक्टेयर तथा कुल उत्पादन 11.53 लाख मैट्रिक टन था। उन्होंने बताया की विश्वविद्यालय द्वारा विकसित राई की प्रमुख प्रजातियां जैसे वरुणा, वैभव, रोहिणी, माया, कांति, वरदान,आशीर्वाद एवं बसंती हैं। जबकि सरसों की टाइप-9, भवानी, तपेश्वरी,आजाद चेतना, पीतांबरी प्रमुख प्रजातियां हैं। डॉ महक सिंह ने बताया की विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2020 में राई की आजाद महक एवं सरसों की आजाद चेतना जैसी प्रजातियों का विकास किया गया है उन्होंने बताया कि वरुणा तथा वैभव जैसी प्रजातियां अर्ध शुष्क दशा में बुवाई हेतु उत्तम होती हैं। उन्होंने कहा कि बुवाई के लिए 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक का समय उचित रहता है। जबकि अति शीघ्र पकने वाली विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कांति प्रजाति की राई का समय 15 सितंबर से 30 सितंबर तक है। तथा विलंब की दशा में 1 नवंबर से 15 नवंबर तक वरदान व आशीर्वाद उत्तम प्रजातियां रहती हैं। डॉ सिंह ने बताया कि वैसे तो विश्वविद्यालय द्वारा विकसित राई सरसों की प्रजातियां पूरे देश में उगाई जा रही हैं। लेकिन विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वरुणा प्रजाति विदेशों में जैसे पाकिस्तान, कनाडा एवं फ्रांस में भी उगाई जा रही हैं। उन्होंने बताया की वरुणा प्रजाति सिंचित एवं असिंचित दोनों दशाओं के लिए संस्तुति है साथ ही साथ बदलती हुई जलवायु में तापक्रम के प्रति सहिष्णु हैं अन्य प्रजातियों की तुलना में रोग व्याधियों कम लगती हैं वरुणा प्रजाति का दाना मोटा एवं तेल की मात्रा अधिक 39 से 41.8% होती है। उन्होंने बताया कि सरसों के तेल का मानव स्वास्थ्य को कई प्रकार से लाभ पहुंचाता है उन्होंने कहा सरसों का तेल स्वास्थ टानिक के रूप में, रक्त निर्माण में योगदान, स्वास्थ ह्रदय, मधुमेह पर नियंत्रण, कैंसर प्रतियोगी, जीवाणु फफूंदी प्रतिरोधी, ठंड और खांसी निवारक, जोड़ों के दर्द और घटिया उपचार तथा अस्थमा निवारक के रूप में प्रयोग किया जाता है। उन्होंने बताया की सरसों से निकलने वाले आवशिष्ठ ठोस पदार्थ को खली कहते हैं खली में 38 से 40% प्रोटीन पाया जाता है जो कि पशु आहार में प्रयोग करते हैं जिससे कि पशुओं को लाभ होता है। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर डी.आर. सिंह ने कहा कि मानव आहार में तेल वसा का महत्वपूर्ण स्थान है वसा में आवश्यक वसीय अम्ल पाए जाते हैं जो हमारे शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। तेलीय वसा में घुलनशील विटामिन ए, ई एवं डी का अच्छा स्रोत है। सामान्यता तेल वसा दो रूपों में पाई जाती है जैसे संतृप्त एवं असंतृप्त वसा। संतृप्त वसा कोलेस्ट्रॉल तथा ट्रांस वसा के रूप में होती है जो हृदय संबंधी, कैंसर,मधुमेह एवं मोटापा आदि  विकारों को बढ़ने से रोकती है।जबकि असंतृप्त वसा ओमेगा 3 ओमेगा 6 मानव की सामान्य वृद्धि, विकास एवं स्वास्थ्य के लिए अधिक उपयोगी है।

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