कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर सलेमपुर मां गंगा के पावन तट के किनारे सैकड़ों वर्ष पुराना मंदिर स्थापित है। जहां बाबा बजरंग बली की बालू की मूर्ति है। कहा जाता है कि गंगा नदी का जलकिस्तर कितना भी बढ़ क्यों न जाए, लेकिन जल मंदिर की सीढ़ियों के नीचे ही रहता है। इस पुराना हनुमान मंदिर में हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन उत्सव की तरह एक बहुत बड़ा मेला लगता है। जहां देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्त आते हैं और बाबा के दर्शन करते है। मंदिर की मान्यता है कि जो भी भक्त गुरु पूर्णिमा के दिन मां गंगा में स्नान व ध्यान करने के बाद बाबा बजरंग बली के दर्शन करता है तो उसके जटिल से जटिल रोग दूर हो जाते हैं। मंदिर में एक दीपक सैकड़ों वर्षों से उसीप्रकार जल रहा है। कहा जाता है कि स्वामी सूरदास ने यह दीपक जलाया था, तब से इसकी ज्योति जल रही है। मंदिर में प्रसाद स्वरुप यहां सिर्फ आम का फल ही चढ़ाया जाता है। इस मंदिर पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह गुरु पूर्णिमा के दिन आए थे और उन्हें सत्ता का सुख मिला था। ढोड़ी घाट के बाबा बजरंगी के दरबार में आम जनता, नेता और अभिनेता गुरु पूर्णिमा के दिन आकर मन्नतें मांगते हैं। बाबा बजरंगबली अपने द्वार पर आए हुए हर भक्त की मनोकामना पूरी करते हैं।
- स्वामी सूरदास ने रखी थी मंदिर की नींव :
करीब चार सौ वर्ष पहले एक साधू गंगा के तट पर ठहरे हुए थे। साधू को दिखाई नहीं देता था, लोग उन्हें सूरदास के नाम से पुकारते थे। मंदिर के पुजारी विकास कुमार ने बताया कि गंगा तट पर स्वामी सूरदास ने तप करना शुरु कर दिया। विकास ने बताया कि तीन वर्ष तप करने के बाद स्वामी सूरदास ने गुरु पूर्णिमा के दिन गंगा से बालू निकाली और बजरंगबली की तीन फीट की मूर्ति बना दी। स्वामी सूरदास ने गांव वालों की मदद से मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बाद उन्होंने भक्तों से कहा कि वह मूर्ति को स्पर्श न करें। उन्होंने मंदिर में एक देहरी बनवाई और कहा कि देहरी के बाहर से उनका दर्शन करें। तभी से मंदिर का नाम ढोड़ी घाट पड़ गया।
- गद्दी संभालने वाले गुरु होते हैं ब्रह्मचारी :
विकास ने बताया कि ढोड़ी घाट में विराजे बाबा बजरंगबली के मंदिर पर स्वामी सूरदास की मौत के बाद स्वामी आत्मराज महाराज को गद्दी मिली थी। इसके बाद कई गुरुओं ने मंदिर की गद्दी संभाली। विकास ने बताया कि यहां की मान्यता है कि जो भी गुरु इस दुनिया से विदा लेता है, वो अपने शिष्य को गद्दी पर विराजमान करवाता था। मंदिर की गद्दी संभालने वाले गुरु ब्रम्हचारी होते हैं। वो मंदिर परिसर से सिर्फ दिन में एक बार बाहर निकलते हैं। गुरु भोजन नहीं करते और दिनभर में एक बार मात्र फल का आहार लेते हैं। गुरु जब गद्दी पर बैठते हैं तो वे मंदिर परिसर छोड़ कर कहीं नहीं जाते। तबियत खराब होने पर आयुर्वेदिक दवाइयों से स्वयं का इलाज करते हैं। मंदिर में गुरु पूर्णिमा का महत्व ये है कि प्रसाद के रूप में यहां गुरुजी को आम चढ़ाया जाता है। वहीं मंदिर के गुरु जी का स्पर्श भी मना है। भक्त केवल गुरु पूर्णिमा के दिन ही गुरु जी का पैर स्पर्श करते सकते हैं। गुरु दर्शन के बाद भक्त वहां पर पहले गुरुओं के खड़ाऊं के भी दर्शन करते हैं। इसके बाद भक्तों को मंदिर की तरफ से प्रसाद के रूप में मेवा का लड्डू भी दिया जाता है।
- जटिल से जटिल रोग ठीक हो जाते है :
सरसौल निवासी रामसुख यादव ने बताया कि वह तीस साल से लगातार हर गुरु पूर्णिमा के दिन ढोड़ी आकर बाबा बजरंगबली के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। इस मंदिर में गुरु पूर्णिमा के दिन हनुमान जी और गुरु जी को प्रसाद के रूप में आम चढ़ाया जाता है। भक्त दर्शन के बाद यहां चल रहे भंडारे का प्रसाद भी ग्रहण करते हैं। भक्तों का मानना है कि सिर्फ बजरंगबली के दर्शन करने से चारपाई पर आया रोगी ठीक होकर अपने पैरों पर चलने लगता है। भक्त शुद्व मन से यहां आकर जो भी मन्नते मांगते हैं, उनकी हर मनोकामना बजरंगबली पूरी करते हैं। यहां पहले के गुरुओं के खड़ाऊं भी रखे हैं, भक्त उनका दर्शन करते हैं। यहां ये चौथे गुरु जी हैं जिनका नाम चैतन्य प्रकाश जी महराज है। सबसे पहले सूर्य स्वामी जी ने मंदिर का निर्माण किया था। उसके बाद आत्म प्रकाश जी महराज, फिर कर्ण प्रकाश जी महराज थे।

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