पत्रकार आशीष अवस्थी पर मुकदमा: सच दिखाना गुनाह हो गया है जिसका जीता जागता उदाहरण है पत्रकारों की आवाज को दबाना, सच को दबाने के लिए कुछ भी करेंगे, चाहे मुकदमा या फिर जेल भेजना पड़ जाए। लेकिन सच को दबाने का प्रयास जारी रखेंगे। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ क्यों कहा जाता है क्या आपने कभी सोचा है..?
दरअसल न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका इनके द्वारा होने वाली गतिविधियों में गड़बड़ी को उजागर कर आम जनमानस के सामने प्रस्तुत करना और एक सत्यता का संदेश समाज में पेश करने के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का निर्माण हुआ था जिसे आप मीडिया के नाम से जानते हैं।
परंतु आज मीडिया को स्वतंत्रता के साथ सच दिखाने के पहले चाटूकारों और ताकतवरों या फिर यूं कहो शासन-प्रशासन के के लिए कुछ भी लिखने से पहले उनकी अनुमति लेना अनिवार्य सा हो गया है यदि आपने सच दिखाने का जरा भी साहस किया तो आपकी आवाज को दबाने का हर वो जतन किया जाएगा ताकि जिससे आप उनके द्वारा किए गए क्रियाकलापों में उलझ जाएं जिससे आपकी आवाज खुदबखुद दब जाए।
ज़ी न्यूज के एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी के खिलाफ केरल पुलिस ने मुकदमा पंजीकृत कर लिया था क्योंकि उन्होंने अपने विशेष प्रोग्राम में “जिहाद” शब्द का इस्तेमाल किया था। जिसके बाद से सोशल मीडिया पर पूरा पत्रकार अमला सुधीर चौधरी के पक्ष में खड़ा हो गया था। सुधीर चौधरी के बाद यूपी के कानपुर जिले के मीडिया ब्रेक न्यूज़ के संपादक आशीष अवस्थी के खिलाफ कानपुर पुलिस ने सिर्फ अपनी साख बचाने व मीडिया की आवाज को दबाने के लिए मुकदमा पंजीकृत कर दिया।
दरअसल हुआ कुछ यूं था कि मीडिया ब्रेक समाचार के संपादक आशीष अवस्थी ने दिनांक 8 मई 2020 को कोरोना महामारी से जूझ रहे होमगार्डो की दुर्दशा को अपनी खबर के माध्यम से उजागर किया था किस तरह से अदृष्य कोरोना से बिना किसी बीमा कवच के होमगार्ड जूझते हुये ड्यूटी कर रहे हैं जबकि पुलिस कर्मियों को कोरोना महामारी की दृष्टिगत उत्तर प्रदेश शासन से बीमा सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है। होमगार्डों और पुलिस कर्मियों के मध्य भेद-भाव की सच्चाई कानपुर पुलिस को नगवार गुजरी और कानपुर पुलिस के उच्च अधिकारियों के इसारे पर मीडिया ब्रेक के संपादक आशीष अवस्थी के खिलाफ कानपुर दक्षिण क्षेत्र के बाबूपुरवा कोतवाली के इंस्पेक्टर राजीव सिंह की तहरीर पर सोशल मीडिया में खबर प्रसारित करने और कानपुर पुलिस की छवि धूमिल करने सहित अन्य गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है खबर 8 मई को प्रसारित हुई मुकदमा 12 मई को पंजीकृत किया गया आखिर 4 दिन तक इंस्पेक्टर बाबू पुरवा राजीव सिंह ने मुकदमा पंजीकृत क्यों नहीं किया..?
क्या किसी दबाव के चलते 4 दिन बाद इस्पेक्टर बाबू पुरवा राजीव सिंह ने सत्त्यता के कलमकार के खिलाफ अपनी कलम चलाई है….?
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर नाजायज कलम चला कर कहीं ना कहीं कानपुर पुलिस ने होमगार्डों के साथ होने वाले अन्याय पर मुहर लगा दी है।aa

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