बच्चों को उतना टॉर्चर करें, जितना बर्दाश्त हो"— मरने से पहले प्रियांशु ने माता-पिता के नाम छोड़ा रुला देने वाला संदेश
अंतिम शब्द
प्रियांशु के नोट का सार:
- बचपन का जख्म: "6 साल की उम्र में जूस पीने पर मुझे निर्वस्त्र कर घर से बाहर निकाला गया।"
- धमकी भरा अनुशासन: "पापा कहते थे नंबर कम आए तो नंगा कर भगा देंगे, डर से मैं मथुरा भाग गया था।"
- मानसिक प्रताड़ना: "हर मिनट का हिसाब और शक की नजरें... बेगैरत की जिंदगी जीने से मरना बेहतर।"
- कड़वी हकीकत: "मैं हार गया, पापा जीत गए। मेरी अंतिम इच्छा है कि पापा मेरी लाश को हाथ न लगा पाएं।"
- अपील: "मां-बाप बच्चों को उतना ही टॉर्चर करें, जितना वो बर्दाश्त कर सकें।"
अंतिम शब्द प्रियांशु के नोट का सार:
- बचपन का जख्म: "6 साल की उम्र में जूस पीने पर मुझे निर्वस्त्र कर घर से बाहर निकाला गया।"
- धमकी भरा अनुशासन: "पापा कहते थे नंबर कम आए तो नंगा कर भगा देंगे, डर से मैं मथुरा भाग गया था।"
- मानसिक प्रताड़ना: "हर मिनट का हिसाब और शक की नजरें... बेगैरत की जिंदगी जीने से मरना बेहतर।"
- कड़वी हकीकत: "मैं हार गया, पापा जीत गए। मेरी अंतिम इच्छा है कि पापा मेरी लाश को हाथ न लगा पाएं।"
- अपील: "मां-बाप बच्चों को उतना ही टॉर्चर करें, जितना वो बर्दाश्त कर सकें।"
6 साल की उम्र से मिल रहा था 'टॉर्चर', मरने से पहले प्रियांशु ने खोली घर की दहलीज के पीछे छिपे भयानक सच की परतें; '9वन टाइम्स' की विशेष रिपोर्ट
कानपुर। औद्योगिक नगरी कानपुर की जिला अदालत (District Court) गुरुवार को उस वक्त सन्न रह गई, जब 23 साल के उभरते हुए अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव ने कचहरी की पांचवीं मंजिल से कूदकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं है, बल्कि एक बेटे की उस चीख का परिणाम है जो सालों से घर की चारदीवारी के बीच घुट रही थी।
बचपन के वो 'जख्म' जो कभी नहीं भरे
मौत को गले लगाने से ठीक 21 मिनट पहले प्रियांशु ने अपने वॉट्सऐप स्टेटस पर 2 पेज का सुसाइड नोट लगाया। इसमें उसने बताया कि कैसे अनुशासन के नाम पर उसका बचपन 'नरक' बना दिया गया।
"जब मैं सिर्फ 6 साल का था, तो फ्रिज से आम का जूस पीने की सजा ये मिली कि मुझे निर्वस्त्र (Naked) करके घर से बाहर निकाल दिया गया।" प्रियांशु ने लिखा कि यह डर उसके मन में ऐसा बैठा कि हाईस्कूल का रिजल्ट आने से पहले, जब पिता ने उसे दोबारा नंगा कर भगा देने की धमकी दी, तो वह डर के मारे ट्रेन पकड़कर मथुरा भाग गया था।
हर मिनट का हिसाब और 'अपंग-नामर्द' जैसे अपशब्द
प्रियांशु ने बताया कि वह एक मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा होने की अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझता था। ग्रेजुएशन के बाद उसने ट्यूशन पढ़ाया, ऑनलाइन काम शुरू किया ताकि घर पर बोझ न बने। उसने अपने पैसों से घर के बिजली बिल भरे, स्कूटी की किस्तें दीं, लेकिन बदले में उसे पिता से सिर्फ 'अपंग', 'विकलांग' और 'नामर्द' जैसी गालियाँ मिलीं।
सुसाइड नोट के अनुसार, कचहरी में पिता के साथ प्रैक्टिस करने के दौरान भी उस पर शक किया जाता था। उसके हर एक मिनट का हिसाब माँगा जाता था। प्रियांशु ने लिखा, "सख्ती और अनुशासन इस हद तक नहीं होना चाहिए कि वो नफरत में बदल जाए।"
15 मिनट तक खिड़की पर बैठा रहा कातिल सन्नाटा
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, प्रियांशु दोपहर में 5वीं मंजिल की टूटी खिड़की पर जाकर बैठ गया था। वह करीब 15 मिनट तक वहां खामोश बैठा रहा। नीचे वकीलों की भीड़ थी, काम का शोर था, लेकिन प्रियांशु के भीतर का शोर शायद उस भीड़ से कहीं ज्यादा था। अंततः उसने छलांग लगा दी। साथी वकील उसे लहूलुहान हालत में उर्सला अस्पताल ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
"मेरी लाश को पापा छू भी न पाएं"
प्रियांशु ने सुसाइड नोट के आखिर में अपनी माँ के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त किया, लेकिन पिता के प्रति उसकी नफरत और दर्द चरम पर था। उसने लिखा:
"मैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं चाहता ताकि मेरा परिवार बर्बाद न हो, लेकिन मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरी लाश को मेरे पापा छू भी न पाएं। मैं हार गया, पापा जीत गए। लव यू मम्मी..."
उसने दुनिया के सभी माता-पिताओं से अपील की कि अपने बच्चों को उतना ही टॉर्चर करें, जितना वो बर्दाश्त कर सकें, वरना हर किसी का यही हश्र होगा।
नाइन वन टाइम्स पड़ताल: 'परवरिश' के नाम पर 'प्रताड़ना' कब तक?
यह घटना सिर्फ प्रियांशु की मौत नहीं, बल्कि उस सोच की हार है जो बच्चों को अपनी निजी संपत्ति समझकर उन पर मानसिक अत्याचार करती है। पुलिस ने प्रियांशु का मोबाइल कब्जे में ले लिया है और सुसाइड नोट के आधार पर जांच शुरू कर दी है।


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