मोबाइल की लत युवाओं के लिए बड़ा खतरा, अब IQ और EQ नहीं बल्कि 'DQ' बनेगा कामयाबी का पैमाना: DM जितेंद्र प्रताप सिंह
कानपुर नगर: डिजिटल क्रांति के इस दौर में तकनीक जहाँ वरदान है, वहीं इसका अनियंत्रित उपयोग युवाओं के भविष्य के लिए एक साइलेंट किलर साबित हो रहा है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के परिसर में आयोजित “फाइटिंग डिजिटल एडिक्शन” कार्यक्रम के दौरान कानपुर के जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने युवाओं को तकनीक के प्रति अनुशासित होने का कड़ा संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब काबिलियत सिर्फ दिमाग (IQ) या भावनाओं (EQ) से नहीं, बल्कि आपके डिजिटल क्वोशेन्ट (DQ) से मापी जाएगी।
हाइलाइट्स (Key Highlights):
- नया पैमाना: अब सिर्फ IQ (बुद्धि) नहीं, बल्कि DQ (डिजिटल क्वोशेन्ट) तय करेगा आपकी असल काबिलियत।
- डोपामिन का जाल: मोबाइल ऐप्स को 'कसीनो की मशीनों' की तरह डिजाइन किया गया है, जो युवाओं को मानसिक रूप से अपना गुलाम बना रहे हैं।
- अटेंशन इकॉनमी: बड़ी कंपनियां आपका 'समय और ध्यान' चुराकर मुनाफा कमा रही हैं, जिससे एकाग्रता खत्म हो रही है।
- सफलता का सूत्र: UPSC टॉपरों और पी.वी. सिंधु का उदाहरण देते हुए DM ने 'डिजिटल अनुशासन' को जीत की पहली सीढ़ी बताया।
- चिंताजनक आंकड़े: कॉलेज जाने वाले 51% छात्र इंटरनेट एडिक्शन की चपेट में हैं, जो अवसाद और तनाव का कारण बन रहा है।
IQ और EQ के बाद अब 'DQ' का दौर
जिलाधिकारी ने अपने संबोधन में एक नई परिभाषा देते हुए कहा कि 20वीं सदी में 'इंटेलिजेंस क्वोशेन्ट' (IQ) को सबसे ऊपर रखा गया। 21वीं सदी की शुरुआत में 'इमोशनल क्वोशेन्ट' (EQ) की अहमियत बढ़ी, लेकिन आज के दौर में 'डिजिटल क्वोशेन्ट' (DQ) ही यह तय करेगा कि आप कितने सफल होंगे। जो व्यक्ति तकनीक पर नियंत्रण रखेगा वही आगे बढ़ेगा, अन्यथा तकनीक उसे अपना गुलाम बना लेगी।
अटेंशन इकॉनमी और डोपामिन का जाल
DM ने बड़ी तकनीकी कंपनियों की कार्यप्रणाली का पर्दाफाश करते हुए बताया कि आज हम 'अटेंशन इकॉनमी' के दौर में जी रहे हैं। मोबाइल ऐप्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे हमारे मस्तिष्क में 'डोपामिन' (खुशी का हार्मोन) रिलीज करवाते हैं। उन्होंने 1954 के मैकगिल विश्वविद्यालय के उस प्रयोग का जिक्र किया जहाँ एक चूहा भोजन-पानी छोड़कर सिर्फ डोपामिन बटन दबाता रहा। आज का युवा भी इसी तरह मोबाइल स्क्रीन के बटन और नोटिफिकेशन के जाल में फंस गया है।
पी.वी. सिंधु और UPSC टॉपरों का दिया उदाहरण
सफलता का मंत्र देते हुए जिलाधिकारी ने अंतर्राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी. सिंधु का उदाहरण दिया, जिनके मोबाइल फोन अभ्यास के दौरान जमा कर लिए जाते थे। साथ ही उन्होंने हालिया सिविल सेवा (UPSC) के नतीजों का हवाला देते हुए कहा कि अधिकांश सफल अभ्यर्थियों ने तैयारी के दौरान सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाए रखी थी।
मनोवैज्ञानिक समस्या और समाधान
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सृजन श्रीवास्तव ने बताया कि डिजिटल लत अब केवल एक आदत नहीं बल्कि गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है। भारत में लगभग 20 से 40 प्रतिशत युवा इसके जोखिम में हैं। इस समस्या से निपटने के लिए विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन मिलकर एक 'थ्री-लेयर मॉडल' पर काम करेंगे, जिसमें छात्र, शिक्षक और अभिभावक तीनों को शामिल किया जाएगा।
विशेष बॉक्स: क्या आप भी हैं डिजिटल लत के शिकार? (चेकलिस्ट)
अगर आपके साथ ये हो रहा है, तो संभल जाइए:
- बिना किसी काम के हर 5 मिनट में फोन चेक करना।
- मोबाइल पास न होने पर बेचैनी या चिड़चिड़ापन महसूस करना।
- सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना कर तनाव में आना।
- देर रात तक फोन चलाने के कारण नींद न आना और सिरदर्द होना।
- परिवार और दोस्तों के साथ होने पर भी फोन में खोए रहना।
- ऑफलाइन हॉबी (खेलना, पढ़ना, घूमना) में रुचि खत्म हो जाना।
उपस्थिति: कार्यक्रम में पारुल राजोरिया, डॉ. संदीप सिंह, डॉ. प्रियंका शुक्ला, डॉ. अनमोल श्रीवास्तव, दुर्गा यादव और अहमद अब्दुल्ला समेत कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
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