- लंबी बीमारी के बाद सिंगापुर में अमर सिंह ने अंतिम सांस ली. अपने निधन से तीन घंटे पहले उन्होंने ट्वीट कर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को श्रद्धांजलि दी थी. वह बीमारी के दौरान भी सोशल मीडिया के जरिए लगातार अपनी बात रखते रहे.
लखनऊ : लंबी बीमारी के बाद अमर सिंह का शनिवार को सिंगापुर में निधन हो गया. वह पिछले 6 महीनों से अपना इलाज सिंगापुर में करा रहे थे. बीमारी के दौरान भी वह ट्विटर पर एक्टिव रहते थे और निधन से तीन घंटे पहले उन्होंने ट्वीट कर लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को श्रद्धांजलि दी थी. ट्वीट में उन्होंने लिखा कि महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देता हूं. उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा.
- आज जिस राजनीतिक शैली के लिए भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह को मीडिया राजनीति के चाणक्य की उपमा देता है, अमर सिंह उस राजनीतिक शैली के पुरोधा थे। वो भी तब जबकि उनके पास महज एक नेता मुलायम सिंह के उत्तर प्रदेश में सीमित जनाधार और एक पार्टी जो एक राज्य तक ही सीमित थी, की ताकत और समर्थन था। जबकि अमित शाह के पास भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी और देश के सत्ता तंत्र की ताकत, देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी समेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों के जनाधार और संगठन बल का समर्थन है।
बीसवीं सदी के आखिरी दशक की शुरुआत में जब देश और दुनिया में जिस आर्थिक उदारवाद और भूमंडलीकरण की शुरुआत हुई उससे राजनीति भी अछूती नहीं रही। इसी दौर में राष्ट्रीय राजनीति में नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, हरिकिशन सिंह सुरजीत और सोनिया गांधी जैसे धीर गंभीर राजनेताओं का वर्चस्व बढ़ा तो देश के अनेक राज्यों में छत्रपों ने भी राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हस्तक्षेप शुरू कर दिया था। हालांकि इसकी शुरुआत 1989 में केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह
की अगुआई में बनी राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार से हो गई थी, जिसमें देवीलाल, चंद्रशेखर, एनटी रामराव, एम करुणानिधि, ज्योति बसु, बीजू पटनायक, रामकृष्ण हेगड़े, अजित सिंह, रामविलास पासवान, शरद यादव जैसे क्षेत्रीय छत्रपों का बोलबाला था। - लेकिन इन छत्रपों के स्वार्थों के टकराव और भाजपा की महत्वाकांक्षाओं ने इस प्रयोग को महज 10-11 महीनों में ही असफल कर दिया था। लेकिन 1990 के बाद जब नरसिंह राव सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण का वैश्विक एजेंडा लागू किया तो भारतीय राजनीति में भी विचार पर बाजार हावी होने लगा और विचार पर अड़े रहने वाले नेताओं ने या तो खुद को एक सीमा तक समझौता परस्त बना लिया या फिर वह राजनीति से बाहर होते चले गए।
- इसी दौर में भारतीय राजनीति में तीन ऐसे नेताओं का उदय हुआ जो विचारधारा पर अड़ने से ज्यादा व्यवहारिक राजनीति को तरजीह देते हुए सियासी समझौते, सौदे और लचीलेपन के हिमायती थे। भाजपा में प्रमोद महाजन, कांग्रेस में अहमद पटेल और समाजवादी पार्टी में अमर सिंह इस बदलती राजनीति के प्रतीक बनकर उभरे। 1996 से 2004 तक अटल आडवाणी युग की भाजपा और एनडीए सरकार में प्रमोद महाजन ने संघ निष्ठ भाजपा में व्यवहारिक राजनीति की वो बुनियाद रखी जिस पर आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सियासत की इमारत खड़ी है। इसी तरह इसी दौर में कांग्रेस में अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव बने और 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनवाने से लेकर 2014 तक उसे चलवाने में सियासत के सफर में जितने भी टेढे मेढ़े रास्ते अपनाए जा सकते थे, उन पर चलते हुए पटेल कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकार साबित हुए।

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