*पुण्यतिथि विशेष :     सूफ़ी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया* - NINE ONE TIMES

निर्भीक आवाज़, निष्पक्ष खबर

Breaking

04/04/2020

*पुण्यतिथि विशेष :     सूफ़ी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया*


भारत पर दिल्ली सल्तनत की हुकूमत थी मंगोल लगातार भारत को लूटने का प्रयास कर रहे थे उस समय जब चारों ओर असहिष्णुता बढ़ रही थी लोगों पर सुल्तानों का जुल्म कम होने का नाम नहीं ले रहा था इस दौरान एक संत ने दिल्ली में अपना डेरा जमाया और फिर यहीं का होकर रह गए*
*उसकी महफिल में हिंदू मुस्लिमों के लिए जगह थी किसी भी धर्म-जाति के आधार पर जुदा न था और उसके विचारों ने समां में उदारता और भावना का प्रवाह किया यहां बात हो रही है चिश्ती सिलसिले के चौथे पीर हजरत प्राइवेटामुद्दीन औलिया की*


*जी हां  वही निजामुद्दीन औलिया जिन्होंने जलती हुई दुनिया में जैसे पानी डाला सुकून-शांति की बात की और प्रेम का प्रसार किया उन्होंने तमाम लोगों को बिना भेदभाव के अपनाया और गले लगाया*


*तो चलिए निजामुद्दीन औलिया और उनके सूफीवाद को जानने की कोशिश करते हैं:*


*बदायूं में जन्म और:*
*संप्रदाय या सिलसिला में सबसे सूफी मशहूर  निजामुद्दीन अपने शागिर्दों में तमाम प्रसिद्धी के कारण हज़रत शेख ख्वाजा सैयद मोहम्मद निजामुद्दीन औलिया बन गए। हजरत निजामुद्दीन का जन्म इस्लामिक कैलेंडर के दूसरे सफर महीने के आखिरी बुधवार को 19 अक्टूबर 1238 ई यूपी के बदायूं में हुआ इनका जन्मदिन सालाना गुसल के रूप में हर साल मनाया जाता है*


*बड़े हुए तो निज़ामुद्दीन हजरत फरीदुद्दीन गंजशकर के सरपरस्त हुए तमाम शिक्षाविदों और खानों ने अपने उस्ताद के माध्यम से उन्हें मिला। में उन्होंने गुरु से मिली शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारा और सूफ़ीवाद के माध्यम से उन्हें फैलाने का काम किया*
*वैसे सूफीवाद की जमीन इश्क से जुड़ी है सूफ़ी अनुयायियों को औलिया कहा जाता है, इसलिए समय के साथ हजरत निजीमुद्दीन के नाम के साथ भी औलिया पदवी जुड़ गए आगे चलकर हजरत निजामुद्दीन औलिया चिश्तिया सिलसिला के अग्रणी पीर बने*


*उदारता के कारण हजरत निजामुद्दीन औलिया के शागिर्द उन्हें महबूब-ए-इलाही यानी अल्लाह से मोहब्बत करने वाला नाम से भी बुलाते थे*


*अहिंसा-प्रेम का पैगाम:*
*1258 ई जब मंगोलों ने मध्य और पश्चिमी एशिया की सांस्कृतिक जगहों को नष्ट किया तब तक दिल्ली महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बना उस समय 20 की  उम्र में हजरत निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली का सफर तय किया किये और सूफीवाद को अपना लिया*


*हजरत निज़ामुद्दीन औलिया ने दिल्ली सल्तनत में तीन दौर देखे, जिसमें से एक दौर गुलाम वंश का था, दूसरा खिलजी और तीसरा तुगलक वंश का*


*इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि तमाम जंगों के बीच तमाम हिंसाओं के बाब लोगों निज़ामुद्दीन ने कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं किया था उन्होंने हमेशा हिंसा के खिलाफ उपदेश दिए और हिंसक लड़ाई और संप्रदायवाद का विरोध भी किया*


*दिल्ली अभी दूर है:*
*दिल्ली अभी दूर है ये कहावत भी निज़ामुद्दीन औलिया से जुड़ी है*


*बात 1320 ई के आसपास की है तब तक दिल्ली सल्तनत का सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक था और निजीमुद्दीन औलिया की अत्यधिक लोकप्रियता के कारण उसने उन्हें दिल्ली छोड़ने का आदेश दे दिया*
*हालांकि इस दौरान खुद गयासुद्दीन दिल्ली में मौजूद नहीं था*


*तब निज़ामुद्दीन ने जवाब में गयासुद्दीन तुगलक से कहा कि हनुज दिल्ली दूरअस्त यानी अभी दिल्ली दूर है  ये इत्तेफाक ही है कि बंगाल से लौटते समय गयासुद्दीन की मौत हो गई और ये अपनी मंजिल दिल्ली तक नहीं पहुंच पाए*



*खुसरो से विशेष लगाव की वजह:*
*निजामुद्दीन औलिया की बात हो और उनके शैतानों के खुसरो का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता अमीर खुसरो के नाना और उनके पिता दोनों ही निजीमुद्दीन के पक्के मुरीद थे बचपन से मिले संस्कारी और पारिवारिक माहौल ने अमीर खुसरो को निजीमुद्दीन औलिया के काफी करीब ला दिया*


*इस तरह अमीर ख़ासो  8 साल की अवस्था से ही निजीमुद्दीन औलिया का दिल बन गया और उनकी सूफ़ीवाद में ऐसी रमा कि निजीमुद्दीन की मौत के बाद मानो उनकी आत्मा भी साथ चली गई, इसके कुछ समय बाद ही इनकी भी मौत हो गई*


*खुसरो अपने गुरु निजामुद्दीन से बहुत प्रेम मानते थे यहाँ तक कि उन्होंने निजीमुद्दीन औलिया को अपनी रचनाओं से भी दूर नहीं किया और जो कुछ भी उनकी पेंसिल से लिखा गया वह सब निजीमुद्दीन से प्रेरित और उन्हीं पर खत्म था*
*कहा जा सकता है कि इमाम खुसरो के लिखित एक-एक शब्द में निजीमुद्दीन औलिया की आत्मा बसती है अमीर खुसरो और निजामुद्दीन औलिया का संबंध गुरु-शिष्य से भी बढ़कर मित्र और परम मित्र का था*


*ऐसे में निजामुद्दीन कहते थे कि खुसरो मेरे विचारों का रखवाला है दिन मुझसे वाले कयामत सवाल पूछा जाएगा कि तू धरती से क्या लाया तो मैं खुसरो को आगे कर दूंगा*


*गरीबों में बांट दिए गए:*
*हजरत निजामुद्दीन औलिया उदार व्यवहार के व्यक्ति थे और कभी भी किसी से भेदभाव नहीं करते थे उनके व्यक्तित्व की एक और मिसाल देखने को तब मिली जब उन्होंने गरीबों में मिला सारा धन बांट दिया*


*कहा जाता है कि खुसरो खां ने सत्ता के लालच में संतों और उल्माओं को अपने पक्ष में करने के लिए राजकोष से निजीमुद्दीन को भी 5 लाख टंका दिया था हालांकि उन्होंने ये रकम गरीबों में बांट दी थी उस समय जब खुसरो ने अपनी राशि वापस मांगी तो उन्होंने उसे लौटाने में असमर्थता व्यक्त की*


*दिल में बसा खुदा:*
*लगभग 60 साल तक दिल्ली में रहने के कारण निजीमुद्दीन औलिया ने दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन देखा अौर उनके संप्रदायवाद और उग्रवाद के बीच शांति अहिंसा और प्रेम को प्रचारित किया*


*आज भी जब ये महान संत हमारे बीच मौजूद नहीं है तब तक दिल्ली के लगभग बीच में स्थित हजरत निजामुद्दीन की दरगाह गंगा-जमुनी तहजीब और सहिष्णुता को बखूबी प्रचारित कर रहा है उनके चाहने वालों की कतार महफिल की ओर से आज भी ढर्रे से जारी है जिस पर कभी अमीर खुसरो गए थे*
*वसंत पंचमी के मौके पर यहां पीले वस्त्र और फूलों का खुमार होता है भारत की संस्कृति में ये आयोजन एक खास तरह के व्यवहार और सहिष्णुता का प्रतीक है इस सूफी वसंत की शुरूआत खुद अमीर ख़ुसरो ने 12 वीं शताब्दी में की थी*


*हजरत निज़ामुद्दीन का मानना ​​था कि खुदा इंसानों के दिल में रहता है तो फिर यह दुखाया हो सकता है ताउम्र जो पैगाम और शिक्षाएँ उन्होंने अपने शिष्यों को दीं उसकी बदौलत आज भी विचार की धारणा पूरे जहाँ को रोशन कर रही है*
*निधन:*
*हज़रत ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन औलिया की मृत्यु 3 अप्रैल 1325 को हुई इनकी दरगाह निज़ामुद्दीन दरगाह दिल्ली में स्थित है                                                                                     


No comments:

Post a Comment

Featured Post

​कानपुर: बेडरूम में प्रेमी संग पकड़ी गई पत्नी, विरोध करने पर पति को चाकू और सरिया से पीटा; गला दबाने की कोशिश

NINE ONE TIMES नौबस्ता में 'वो' के चक्कर में उजाड़ा सुहाग: पति पर जानलेवा हमला कर प्रेमी संग फरार हुई बीवी; पुलिस ने दर्ज की FIR ...

खबर को दोस्तों के साथ शेयर करें:

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here

Pages