अन्य वे महत्वपूर्ण अधिकार जो भारतीय संविधान ने हमें क्या-क्या अधिकार और शक्तियाँ प्रदान किए हैं:-*
*अध्याय 1️⃣1️⃣*
*प्रेस परिषद् अधिनियम ,1978:-*
भारतीय प्रेस परिषद एक संविघिक स्वायत्तशासी संगठन है जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने व उसे बनाए रखने, जन अभिरूचि का उच्च मानक सुनिश्चित करने से और नागरिकों के अघिकारों व दायित्वों के प्रति उचित भावना उत्पन्न करने का दायित्व निबाहता है। सर्वप्रथम इसकी स्थापना 4 जुलाई सन् 1966 को हुई थी.
अध्यक्ष परिषद का प्रमुख होता है जिसे राज्यसभा के सभापति, लोकसभा अघ्यक्ष और प्रेस परिषद के सदस्यों में चुना गया एक व्यक्ति मिलकर नामजद करते हैं। परिषद के अघिकांश सदस्य पत्रकार बिरादरी से होते हैं लेकिन इनमें से तीन सदस्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग,बार कांउसिल आफ इंडिया और साहित्य अकादमी से जुड़े होते हैं तथा पांच सदस्य राज्यसभा व लोकसभा से नामजद किए जाते हैं – राज्य सभा से दो और लोकसभा से तीन
प्रेस परिषद, प्रेस से प्राप्त या प्रेस के विरूद्ध प्राप्त शिकायतों पर विचार करती है। परिषद को सरकार सहित किसी समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार को चेतावनी दे सकती है या भर्त्सना कर सकती है या निंदा कर सकती है या किसी सम्पादक या पत्रकार के आचरण को गलत ठहरा सकती है। परिषद के निर्णय को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। काफी मात्रा में सरकार से घन प्राप्त करने के बावजूद इस परिषद को काम करने की पूरी स्वतंत्रता है तथा इसके संविघिक दायित्वों के निर्वहन पर सरकार का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है।
प्रेस परिषद् की शक्तियाँ निम्नानुसार अधिनियम की धारा 14 और 15 में दी गई हैं।
*परिनिंदा करने की शक्ति*
14.1 समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार को चेतावनी दे सकेगी, उसकी भर्त्सना कर सकेगी या उसकी परिनिंदा कर सकेगी या उस संपादक या पत्रकार के आचरण का अनुमोदन कर सकेगी, परंतु यदि अध्यक्ष की राम में जाँच करने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं है तो परिषद् किसी परिवाद का संज्ञान नहीं कर सकेगी।
14.2 यदि परिषद् की यह राय है कि लोकहित् में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह किसी समाचारपत्र से यह अपेक्षा कर सकेगी कि वह समाचारपत्र या समाचार एजेंसी, संपादक या उसमें कार्य करने वाले पत्रकार के विरूद्ध इस धारा के अधीन किसी जाँच से संबंधित किन्हीं विषयों को, जिनके अंतर्गत उस समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार का नाम भी है उसमें ऐसी नीति से जैसा परिषद् ठीक समझे प्रकाशित करे।
14.3 उपधारा 1, की किसी भी बात से यह नहीं समझा जायेगा कि वह परिषद् को किसी ऐसे मामले में जाँच करने की शक्ति प्रदान करती है जिसके बारे में कोई कार्रवाई किसी न्यायालय में लम्बित हो।
14.4 यथास्थिति उपधारा 1, या उपधारा 2, के अधीन परिषद् का विनिश्चय अंतिम होगा और उसे किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जायेगा।
*परिषद् की साधारण शक्तियाँ*
14.5 इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन या कोई जाँच करने के प्रयोजन के लिए परिषद् को निम्नलिखित बातों के बारे में संपूर्ण भारत में वे ही शक्तियाँ होंगी जो वाद का विचारण करते समय
1908 का 5, सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन निहित हैं, अर्थात-
*(क) व्यक्तियों को समन करना और हाजिर कराना तथा उनकी शपथ पर परीक्षा करना*
*(ख) दस्तावेजों का प्रकटीकरण और उनका निरीक्षण*
*(ग) साक्ष्य का शपथ कर लिया जाना*
*(घ) किसी न्यायालय का कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपियों की अध्यपेक्षा करना*
*(ड़) साक्षियों का दस्तावेज़ की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना*
*(च) कोई अन्य विषय जो विहित जाए*
2, उपधारा 1, की कोई बात किसी समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, संपादक या पत्रकार को उस समाचारपत्र द्वारा प्रकाशित या उस समाचार एजेंसी, संपादक या पत्रकार द्वारा प्राप्त रिपोर्ट किये गये किसी समाचार या सूचना का स्रोत प्रकट करने के लिए विवश करने वाली नहीं समझी जायेगी।
1860 का 45, 3, परिषद् द्वारा की गयी प्रत्येक जाँच भारतीय दंड संहिता की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जायेगी।
4, यदि परिषद् अपने उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए या अधिानियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए आवश्यक समझती है तो वह अपने किसी विनिश्चय में या रिपोर्ट में किसी प्राधिकरण के, जिसके अन्तर्गत सरकार भी है, आचरण के संबंध में ऐसा मत प्रकट कर सकेगी जो वह ठीक समझे। शिक्षाविदों की विशिट मंडली द्वारा संवारा गया है।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायामूर्ति श्री जे. आर. मधोलकर, पहले अध्यक्ष थे जिन्होंने 16 नवम्बर 1966 से 1 मार्च 1968 तक परिषद् की अध्यक्षता की।
अपने कार्य करने के लिये अथवा अधिनियम के अंतर्गत जाँच करने के लिये, परिषद् निम्नलिखित मामलों के सबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत एक मुकदमें की छानबीन के लिये सिविल न्यायालय में निहित कुछ अधिकारों का इस्तेमाल करती है
*(क) लोगों को सम्मन करने और उपस्थिति हेतु दबाव डालने तथा शपथ देकर उनका परीक्षण करने हेतु*
*(ख) दस्तावेजों की खोज और निरीक्षण की आवश्यकता हेतु*
*(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य की प्राप्ति हेतु*
*(घ) किसी न्यायालय अथवा कार्यालय से किसी सरकारी रिकार्ड अथवा इसकी प्रतियों की मांग हेतु*
*(ड.) गवाहों अथवा दस्तावेजों के परीक्षण हेतु कमीशन जारी करना और*
*(च) कोई अन्य मामला, जैसकि निर्दिष्ट किया जाये*
प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 की धारा 13 2 ख्र द्वारा परिषद् को समाचार कर्मियों की संहायता तथा मार्गदर्शन हेतु उच्च व्ययवसायिक स्तरों के अनुरूप समाचारपत्रों; समाचारं एजेंसियों और पत्रकारों के लिये आचार संहिता बनाने का व्यादेश दिया गया है। ऐसी संहिता बनाना एक सक्रिय कार्य है जिसे समय और घटनाओं के साथ कदम से कदम मिलाना होगा।
*मार्गनिर्देश और नीति निर्माण:*
परिषद् ने मार्गनिर्देश जारी किये है और प्रेस तथा लोगों से सम्बंद्ध विभिन्न मामलों पर नीति रूपरेखा की सिफारिश की। इसके अतिरिक्त जहाँ कहीं भी गंभीर स्थिति पैदा हुई जिसमें प्रेस से संयम और सावधानी के साथ कार्य करने की आशा की गई वहाँ परिषद् के अध्यक्ष, वक्तव्यों के माध्यम से प्रेस का मार्गदर्शन करते रहे हैं। जब कभी भी सुनियोजित बृहत हमले किये गये, तब इन्होंने ऐसे वक्तव्यों के माध्यम से तीव्र प्रतिक्रिया भी की।
1969 में, परिषद् ने सांप्रदायिक संबंधों से सम्बद्ध मामलों पर रिपोर्टिंग और टिप्पणियाँ करने में नियमों और स्तरों को निर्दिट करते हुए 10-सूत्री मार्गनिर्देश जारी किये। सुविस्तार के बिना मार्गनिर्देशों में यह सूचीबद्ध और स्पट किया गया कि पत्रकारिता औचित्य और नीति के विरूद्ध क्या आपत्तिजनक होगा, अतः उससे बचना चाहिए। पुनः 1990 में अयोध्या की घटनाओं को देखते हुए, परिषद् ने 1969 के मार्गनिर्देशों को दोहराते हुए, नये अनुभव के प्रकाश में अन्य 12 सूत्री मार्गनिर्देश जारी किये। परिषद् ने कहा कि इसमें रेखांकित सिद्धांत प्रशिक्षण की अवस्था से लेकर मीडिया के प्रत्येक स्तर पर अंतर्निविट किये जाने चाहिए। इन सिद्धांतों संलग्नक बी-2 ने प्रेस और राज्य दोनों के लिये कुछ कार्य करने और कुछ कार्य न करने निर्दिष्ट किये।
*कुछ प्रमुख कार्य:*
*Ø मीडिया में महिलाओं का चिंत्रांकन (1996)*
*Ø लघु और मझौले समाचारपत्रों की समस्यायें (1996)*
*Ø समाचारपत्रों का बंद होना और उर्दू समाचारपत्रों की समस्यायें*
*Ø पत्रकारों पर अनुग्रह करना*
*Ø विधानों का परीक्षण*
*Ø सूचना के गोपनीय स्रोत की सुरक्षा*
*Ø प्रेस और पंजीकरण अपील बोर्ड आदि*
*अध्याय 1️⃣2️⃣*
†श्रमजीवी पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मी अधिनियम ,1955†
*परिचय:*
पत्रकारों के लिए सन 1955 में संसद ने पत्रकारों की चिरकालीन मांग को मूर्त रूप देते हुए श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम,1955 पारित किया.इसका उद्देश्य समाचारपत्रों और संवाद समितियों में काम करनेवाले श्रमजीवी पत्रकारों तथा अन्य व्यक्तियों के लिए कतिपय सेवा-शर्तें निर्धारित व विनियमित करना था.इससे पहले अखबारी कर्मचारियों को श्रेणीबद्ध करने,कार्य के अधिकतम निर्धारित घंटों, छुट्टी,मजदूरी की दरों के निर्धारण और पुनरीक्षण करने,भविष्य-निधि और ग्रेच्युटी आदि के बारे में कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी.पत्रकारों को कानूनी तौर पर कोई आर्थिक व सेवारत सुरक्षा प्राप्त नहीं थी.
*श्रमजीवी पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मी अधिनियम ,1955*
पत्रकारों को कानूनी तौर पर कोई आर्थिक व सेवारत सुरक्षा प्राप्त नहीं थी.इस कानून में समाज में पत्रकार के विशिष्ट कार्य और स्थान तथा उसकी गरिमा को मान्यता देते हुए संपादक और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों के हित में कुछ विशेष प्रावधान किए गए हैं.इनके आधार पर उन्हें सामान्य श्रमिकों से,जो औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम,1947 से विनियमित होते हैं,कुछ अधिक लाभ मिलते हैं.पहले यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं था पर 1970 में इसका विस्तार वहां भी कर दिया गया.अतः अब यह सारे देश के पत्रकारों व अन्य समाचारपत्र-कर्मियों के सिलसिले में लागू है
*परिभाषा*
श्रमजीवी पत्रकार की कानूनी परिभाषा पहली बार इस अधिनियम से ही की गई.इसके अनुसार श्रमजीवी पत्रकार वह है जिसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता हो और वह किसी समाचारपत्र स्थापन में या उसके सम्बन्ध में पत्रकार की हैसियत से नौकरी करता हो.इसके अन्तर्गत संपादक,अग्रलेख- लेखक, समाचार-संपादक,समाचार संवाददाता उप-संपादक, फीचर लेखक,प्रकाशन-विवेचक (कॉपी,टेस्टर),रिपोर्टर,संवाददाता (कौरेसपोंडेंट),व्यंग्य-चित्रकार (कार्टूनिस्ट),संचार फोटोग्राफर और प्रूफरीडर आते हैं.अदालतों के निर्णयों के अनुसार पत्रों में काल करनेवाले उर्दू-फारसी के कातिब,रेखा-चित्रकार और सन्दर्भ-सहायक भी श्रमजीवी पत्रकार हैं.कई पत्रों के लिए तथा अंशकालिक कार्य करनेवाला पत्रकार भी श्रमजीवी पत्रकार है यदि उसकी आजीविका का मुख्य साधन अर्थात उसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता है.किन्तु,ऐसा कोई व्यक्ति जो मुख्य रूप से प्रबंध या प्रशासन का कार्य करता है या पर्यवेक्षकीय हैसियत से नियोजित होते हुए या तो अपने पद से जुड़े कार्यों की प्रकृति के कारण या अपने में निहित शक्तियों के कारण ऐसे कृत्यों का पालन करता है जो मुख्यतः प्रशासकीय प्रकृति के हैं,तो वह श्रमजीवी पत्रकार की परिभाषा में नहीं आता है.इस तरह एक संपादक श्रमजीवी पत्रकार है यदि वह मुख्यतः प्रशासकीय प्रकृति के हैं,तो वह श्रमजीवी पत्रकार की परिभाषा में नहीं आता है.इस तरह एक संपादक श्रमजीवी पत्रकार है यदि वह मुख्यतः सम्पादकीय कार्य करता है और संपादक के रूप में नियोजित है.पर यदि वह सम्पादकीय कार्य कम और मुख्य रूप से प्रबंधकीय या प्रशासकीय कार्य करता है तो वह श्रमजीवी पत्रकार नहीं रह जाता है
अधिनियम की धारा 3 (1) से श्रमजीवी पत्रकारों के सम्बन्ध में वे सब उपबंध लागू किये गए हैं जो औद्योगिक विकास अधिनियम,1947 में कर्मकारों (वर्कमैन)पर लागू होते हैं |
*छंटनी का नियम:*
धारा 3 (2) के जरिये पत्रकारों की छंटनी के विषय में यह सुधार कर दिया गया है कि छंटनी के लिए संपादक को छह मास की और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों को तीन मास की सूचना देनी होगी.संपादकों और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों को इस सुधार के साथ-साथ वह सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त है जो औद्योगिक विकास कानून के अन्तर्गत अन्य कर्मकारों को सुलभ है |
*तनख्वाह के संबंध में:*
धारा 8 (1) में उपबंधित किया गया है कि केंद्रीय सरकार एक निर्धारित रीति से श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य समाचारपत्र-कर्मचारियों के लिए मजदूरी की दरें नियत कर सकेगी और धारा 8 (2) के तहत मजदूरी कि दरों को वह ऐसे अंतरालों पर, जैसा वह ठीक समझे, समय-समय पर पुनरीक्षित कर सकेगी। दरों का निर्धारण और पुनरीक्षण कालानुपाती (टाइम वर्क) और मात्रानुपाती (पीस वर्क) दोनों प्रकार के कामों के लिए किया जा सकेगा। इसलिए धारा 9 में एक मजदूरी बोर्ड के गठन का प्रावधान किया गया है। वर्तमान में मजीठिया वेतन बोर्ड लागू है और मजदूरी दरें वेतन बोर्ड की दरों से किसी तरह कम नहीं होगी नहीं तो धारा 13 के तहत अधिनियम का उल्लंघन करने के आरोप में 500 रूपए का जुर्माना अदा करना पड़ेगा
†काम का समय:†
धारा 6 के तहत काम के समय का प्रावधान है। चार सप्ताहों में 144 घंटों से ज्यादा काम नहीं लिया जा
सकता। सात दिन में एक दिन (24 घंटे) का विश्राम। दो प्रकार की छुट्टियां हैं पहली उपार्जित छुट्टी और
चिकित्सा छुट्टी। उपार्जित छुट्टी काम पर व्यतीत अवधि की 1/11 से कम नहीं होगी और यह पूरी तनख्वाह पर मिलेगी। चिकित्सा प्रमाण-पत्र पर चिकित्सा छुट्टियाँ कार्य पर व्यतीत अवधि की 1/18 से कम नहीं होंगी। यह आधी तनख्वाह पर दिया जाएंगा। मतलब एक माह की उपार्जित छुट्टी व चार सप्ताह की मेडिकल छुट्टी (आधे वेतन पर)। वैसे धारा 7 के तहत काम के घंटों का प्रावधान संपादक पर लागू नहीं होता। लेकिन श्रमजीवी पत्रकारों से दिन की पारी में 6 घंटे से ज्यादा व रात्रि की पारी में साढ़े पांच घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। दिन में चार घंटे में एक घंटे का विश्राम व रात्रि में तीन घंटे में आधे घंटे का विश्राम दिया जायेगा। एक पत्रकार वर्ष में 10 सामान्य छुट्टियों का अधिकारी है। लेकिन यदि किसी कारणवश छुट्टी के दिन भी कार्य करना पड़ता है तो मालिक व पत्रकार की सहमति से किसी अन्य दिन छुट्टी ले सकता है। 11 माह में एक माह की उपार्जित छुट्टी दी जाएगी।
किन्तु 90 उपार्जित छुट्टियां एकत्र हो जाने के बाद और छुट्टियां उपार्जित नहीं मानी जायेंगी। सामान्य छुट्टियों, आकस्मिक छुट्टियों और टीका छुट्टी की अवधि को काम पर व्यतीत अवधि माना जाएगा। प्रत्येक 18 मास की अवधि में एक मास की छुट्टी चिकित्सक के प्रमाण-पत्र पर दी जाएगी। यह छुट्टी आधे वेतन पर होगी। ऐसी महिला श्रमजीवी पत्रकारों को, जिनकी सेवा एक वर्ष से अधिक की हो, तीन मास तक की प्रसूति छुट्टी दी जाएगी। यह छुट्टी गर्भपात होने पर भी सुलभ की जाएगी। इसके अलावा नियोजक की इच्छा पर वर्ष में 15 दिन की आकस्मिक छुट्टी दी जाएगी
*अध्याय 1️⃣3️⃣*
*भारतीय तार अधिनियम,1885*
भारतीय तार अधिनियम ,1885 भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान ही अस्तित्व में आया था|इस अधिनियम के अनुसार सरकार को यह अधिकार है की वह किसी तार-सन्देश को प्रेषित ही न करे अथवा उसे बिच में ही रोक लें |
*तार अधिनियम और मीडिया*
भारतीय तार अधिनियम 1885 की धारा 5 ही मीडिया से संबंधित है इस कारण से यहाँ इसी धारा का चर्चा किया जा रहा है |
सार्वजनिक आपात स्थिति होने या सार्वजनिक सुरक्षा के हीत में भारत सरकार,राज्य सरकार, प्राधिकृत अधिकारी यदि चाहे तो तार संबंधी उपकरण अस्थाई रूप से अपने अधिकार में ले सकता है
*धारा 5(2) के अनुसार*
सार्वजनिक आपात स्थिति पैदा होने या सार्वजनिक हित में आवश्यक होने पर केंद्र या राज्य सरकार या फिर प्राधिकृत अधिकारी ऐसी आवश्यकता से संतुष्ट होने पर या फिर भारत के एकता,अखंडता एवं सुरक्षा या विदेशों से मैत्रीपूर्ण संबंधब या अपराध की रोकथाम के लिए संप्रेषित तार (सन्देश) को रोका जा सकता है|
*अध्याय 1️⃣4️⃣*
*भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957*
*परिचय :*
कापीराइट का अर्थ है किसी कृति के संबंध में किसी एक व्यक्ति, व्यक्तियों या संस्था का निश्चित अवधि के लिये अधिकार। मुद्रणकला का प्रचार होने के पूर्व किसी रचना या कलाकृति से किसी के आर्थिक लाभ उठाने का कोई प्रश्न नहीं था। इसलिये कापीराइट की बात उसके बाद ही उठी है। कापीराइट का उद्देश्य यह है कि रचनाकार, या कलाकार या वह व्यक्ति अथवा संस्था जिसे कलाकार या रचनाकार ने अधिकार प्रदान किया हो उस कलाकृति और रचना से निर्धारित अवधि तक आर्थिक लाभ उठा सके तथा दूसरा कोई इस बीच उससे उस रूप में लाभ न उठा पाए।
भारत में इस समय कापीराइट (प्रतिलिप्यधिकार या कृतिस्वाम्य) की जो व्यवस्था है वह 1957 के प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों द्वारा परिचालित होती है। इसके पूर्व भारत में 1914 में जो कापीराइट ऐक्ट बना था वह बहुत कुछ ब्रिटेन के ‘इंपीरियल कापीराइट ऐक्ट (1911)’ पर आधारित था। ब्रिटेन का यह कानून और उसके नियम, जो भारतीय स्वाधीनता अधिनियम के अनुच्छेद 18 (3) के अनुसार अनुकूलित कर लिए गए थे, 1957 तक चलते रहे। 1957 में नया कानून बनने पर पुराना कानून निरस्त हो गया।
*भारतीय प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम, 1957*
हमारे देश में इस समय जो प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम 1957 से लागू है उसके अनुसार यह व्यवस्था है कि अधिनियम के अमल में आने के बाद से एक प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय स्थापित किया गया है जो इसी कार्य के लिये नियुक्त एक रजिस्ट्रार के अधीन है। इस रजिस्ट्रार को केंद्रीय सरकार के नियंत्रण और निर्देशन में काम करना पड़ता है तथा उसके कई सहायक हैं। इस कार्यालय का मुख्य काम यह है कि वह एक रजिस्टर रखे जिसमें लेखक या रचनाकार के अनुरोध पर रचना का नाम, रचनाकार या रचनाकारों के नाम, पते और कापीराइट जिसे हो उसके नाम, पते दर्ज किए जाएँ।
इसके साथ ही एक प्रतिलिप्यधिकार मंडल (कापीराइट बोर्ड) की स्थापना की गई जिसका कार्यालय प्रधान भी रजिस्ट्रार ही होता है। इस मंडल को किन्हीं मामलों में दीवानी अदालतों के अधिकार प्राप्त हैं। रजिस्ट्रार के आदेशों के विरोध में इस मंडल में अपील भी की जा सकती है।
मंडल का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का जज, या सेवानिवृत्त जज हो सकता है तथा उसको सहायता के लिये नियुक्त तीनों व्यक्तियों के लिये यह आवश्यक है कि वे साहित्य और कलाओं के जानकार हों। इसके आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
*यहां प्रयुक्त कार्यों का अर्थ हैं :*
साहित्यिक रचना :- इसमें कम्प्यूटर कार्यक्रम, सारणियां, संकलन और कम्प्यूटर डाटाबेस शामिल हैं।
नाट्य रचना :- इसमें गायन, नृत्य रचना या किसी प्रदर्शन में मनोरंजन का कोई रूप, नाट्य प्रबंध या अभिनय जिसका रूप लिखित या किसी अन्य रूप में तय हो, शामिल हैं।
संगीत रचना :- इसमें संगीत रचनाएं शामिल हैं, ऐसी रचनाओं का ग्राफीय रूप शामिल है लेकिन इसमें संगीत के साथ गाए, बोले या अभिनीत किए जाने वाले शब्द या अंगविक्षेप शामिल नहीं हैं।
कलात्मक रचना :- इसका अर्थ है चित्र, मूर्ति, आलेख (जिसमें आरेख, मानचित्र, चार्ट या प्लान भी शामिल है), उत्कीर्णन, या फोटोग्राफ, भले ही उनमें कलात्मक गुण हों या न हों। इसमें स्थापत्य रचनाएं और कलात्मक कारीगरी की कोई अन्य रचनाएं भी शामिल हो सकती हैं।
चलचित्र रचना :- इसका अर्थ है किसी ऐसी प्रक्रिया में जरिए, जिससे किसी भी तरह चलती-फिरती छवि निर्मित की जा सकती है, बनाए गए किसी माध्यम पर दृश्य रिकार्डिंग की कोई रचना।
ध्वनि रिकार्डिंग :- इसका अर्थ है ध्वनियों की रिकार्डिंग जिससे ध्वनियां निर्मित की जा सकती हैं, उस माध्यम पर ध्यान दिए बिना, जिससे ध्वनियां निर्मित की गई हो।
यहां ‘संबंधित अधिकार या निकटवर्ती अधिकार’ है कलाकारों (उदाहरणार्थ अभिनेताओं,गायकों और संगीतकारों), फोनोग्राम (ध्वनि रिकार्डिंग) के निर्माताओं और प्रसारण संगठनों के अधिकार।
*सन 1984 में किए गए संशोधन*
विडियो फ़िल्में भी सिनेमा फिल्मों की भांति होती है |
साहित्यिक कृति में संकलन ,कंप्यूटर डिस्क तथा सूचनाओं को संग्रहित करने वाले कंप्यूटर उपकरण भी शामील होंगे|
प्रत्येक रिकॉर्ड तथा विडियो के पैक पर ऐसी घोषणा छापना आवश्यक है कि-उनमें किसी प्रतिलिप्यधिकार का उल्लंघन नहीं किया गया और विडियो फ़िल्में के प्रदर्शन के लिए आवश्यक प्रमाणीकरण करा लिया गया है |
कानून का उल्लंघन करने पर एक वर्ष के स्थान पर न्यूनतम 6 मास और अधिकतम 3 वर्ष के कारागार अथवा जुर्माने या दोनों की सजा दी जा सकती है |
दोबारा अपराध करने पर दंड दुगुना भी किया जा सकता है |
*अध्याय 1️⃣5️⃣*
*सूचना का अधिकार विधेयक ,1996†
*परिचय:*
मैग्सैसे अवार्ड विजेता श्रीमती अरूणा रॉय के नेतृत्व में व मजदूर किसान शक्ति संगठन के बैनर तले सूचना का अधिकार के लिए वर्ष 1992 में राजस्थान से आंदोलन शुरू हुआ था। इसी क्रम में अप्रेल 1996 में सूचना के अधिकार की मांग को लेकर चालीस दिन का धरना दिया गया। राजस्थान सरकार पर दबाब बढ़ने पर तत्कालीन मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने वर्ष 2000 में राज्य स्तर पर सूचना का अधिकार कानून अस्तित्व में लाया। इसके बाद देखते ही देखते नौ राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, असम, गोवा व मध्यप्रदेश में सूचना का अधिकार कानून लागू हो गया। कॉमन मिनियम प्रोग्राम में सूचना के अधिकार अधिनियम को लोकसभा में पारित करने का संकल्प लिया गया था तथा नेशनल एडवायजरी कॉन्सिल के सतत् प्रयास से यह कानून देश में लागू हो गया है।
वर्ष 2002 में केन्द्र की राजग सरकार ने सूचना की स्वतंत्रता विधेयक पारित कराया, लेकिन वह राजपत्र में प्रकाशित नहीं होने से कानून का रूप नहीं ले सका। इस विधेयक में सिर्फ सूचना लेने की स्वतंत्रता दी, सूचना देना या नहीं देना अधिकारी की मर्जी पर छोड दिया।
वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के नेतृत्व वाली केन्द्र की संप्रग सरकार ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया, जिसने अगस्त 2004 में केन्द्र सरकार को सूचना का स्वतंत्रता अधिनियम में संशोधन सुझाए और उसी वर्ष यह विधेयक संसद में पेश हो गया। 11 मई 2005 को विधेयक को लोकसभा ने और 12 मई 2005 को राज्यसभा ने मंजूरी दे दी। 15 जून 2005 को इस पर राष्ट्रपति की सहमति मिलते ही सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 पूरे देश में प्रभावशील हो गया। उक्त अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (1) एवं धारा 12, 13,15, 16, 24, 27, 28 की उपधाराएं (1) एवं (2) तत्काल प्रभाव में आ गई और शेष प्रावधान अधिनियम बनने की तिथि से 120 वें दिन अर्थात् 12 अक्टूबर 2005 से लागू किया गया। प्रत्येक राज्य में आयोग का गठन करने का प्रावधान रखा गया।
*सूचना का तात्पर्यः*
रिकार्ड, दस्तावेज, ज्ञापन, ईःमेल, विचार, सलाह, प्रेस विज्ञप्तियाँ, परिपत्र, आदेश, लांग पुस्तिका, ठेके सहित कोई भी उपलब्ध सामग्री, निजी निकायो से सम्बन्धित तथा किसी लोक प्राधिकरण द्वारा उस समय के प्रचलित कानून के अन्तर्गत प्राप्त किया जा सकता है।
सूचना का अधिकार-सांविधानिक प्रावधान:
सूचना के अधिकार का दर्ज़ा उपयोगिता और इस बात से सिद्ध होता है कि संविधान में इसे मूलभूत अधिकार का दर्ज़ा दिया गया है। आरटीआई का अर्थ है सूचना का अधिकार और इसे संविधान की धारा 19 (1) के तहत एक मूलभूत अधिकार का दर्जा दिया गया है। धारा 19 (1),जिसके तहत प्रत्येक नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है और उसे यह जानने का अधिकार है कि सरकार कैसे कार्य करती है, इसकी क्या भूमिका है, इसके क्या कार्य हैं आदि।सूचना का अधिकार अधिनियम प्रत्येक नागरिक को सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार देता है और इसमें टिप्पणियां, सारांश अथवा दस्तावेजों या अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों या सामग्री के प्रमाणित नमूनों की मांग की जा सकती है।
आरटीआई अधिनियम पूरे भारत में लागू है (जम्मू और कश्मीर राज्य के अलावा) जिसमें सरकार की अधिसूचना के तहत आने वाले सभी निकाय शामिल हैं जिसमें ऐसे गैर सरकारी संगठन भी शामिल है जिनका स्वामित्व, नियंत्रण अथवा आंशिक निधिकरण सरकार द्वारा किया जाता है
*सूचना प्राप्ति की प्रक्रिया*
आप सूचना के अधिकार अधिनियम- 2005 के अंतर्गत किसी लोक प्राधिकरण (सरकारी संगठन या सरकारी सहायता प्राप्त गैर सरकारी संगठनों) से सूचना प्राप्त कर सकते हैं।
आवेदन हस्तलिखित या टाइप किया होना चाहिए। आवेदन प्रपत्र भारत विकास प्रवेशद्वार पोर्टल से भी डाउनलोड किया जा सकता है। आवेदन प्रपत्र डाउनलोड संदर्भित राज्य की वेबसाईट से प्राप्त करें
आवेदन अँग्रेजी, हिन्दी या अन्य प्रादेशिक भाषाओं में तैयार होना चाहिए।
*अपने आवेदन में निम्न सूचनाएँ दें:*
*Ø सहायक लोक सूचना अधिकारी/लोक सूचना अधिकारी का नाम व उसका कार्यालय पता*,
*Ø विषय: सूचना का अधिकार अधिनियम- 2005 की धारा 6 (1) के अंतर्गत आवेदन*
*Ø सूचना का ब्यौरा, जिसे आप लोक प्राधिकरण से प्राप्त करना चाहते हैं*
*Ø आवेदनकर्त्ता का नाम*,
*Ø पिता/पति का नाम,*
*Ø वर्ग- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ी जाति*
*Ø आवेदन शुल्क*
*Ø क्या आप गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवार से आते हैं- हाँ/नहीं*
*Ø मोबाइल नंबर व ई-मेल पता (मोबाइल तथा ई-मेल पता देना अनिवार्य नहीं)*
*Ø पत्राचार हेतु डाक पता*
*Ø स्थान तथा तिथि*
*Ø आवेदनकर्त्ता के हस्ताक्षर*
*Ø संलग्नकों की सूची*
आवेदन जमा करने से पहले लोक सूचना अधिकारी का नाम, शुल्क, उसके भुगतान की प्रक्रिया आदि के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें।
सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना प्राप्त करने हेतु आवेदन पत्र के साथ शुल्क भुगतान का भी प्रावधान है। परन्तु अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति या गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के सदस्यों को शुल्क नहीं जमा करने की छूट प्राप्त है।
जो व्यक्ति शुल्क में छूट पाना चाहते हों उन्हें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/बीपीएल प्रमाणपत्र की छायाप्रति जमा करनी होगी।
आवेदन हाथो-हाथ, डाक द्वारा या ई-मेल के माध्यम से भेजा जा सकता है।
यदि आप आवेदन डाक द्वारा भेज रहे हैं तो उसके लिए केवल पंजीकृत (रजिस्टर्ड) डाक सेवा का ही इस्तेमाल करें। कूरियर सेवा का प्रयोग कभी न करें।
आवेदन ई-मेल से भेजने की स्थिति में जरूरी दस्तावेज का स्कैन कॉपी अटैच कर भेज सकते हैं। लेकिन शुल्क जमा करने के लिए आपको संबंधित लोक प्राधिकारी के कार्यालय जाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में शुल्क भुगतान करने की तिथि से ही सूचना आपूर्ति के समय की गणना की जाती है।
आगे उपयोग के लिए आवेदन पत्र (अर्थात् मुख्य आवेदन प्रपत्र, आवेदन शुल्क का प्रमाण,स्वयं या डाक द्वारा जमा किये गये आवेदन की पावती) की 2 फोटोप्रति बनाएं और उसे सुरक्षित रखें।
यदि अपना आवेदन स्वयं लोक प्राधिकारी के कार्यालय जाकर जमा कर रहे हों, तो कार्यालय से पावती पत्र अवश्य प्राप्त करें जिसपर प्राप्ति की तिथि तथा मुहर स्पष्ट रूप से अंकित हों। यदि आवेदन रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेज रहे हों तो पोस्ट ऑफिस से प्राप्त रसीद अवश्य प्राप्त करें और उसे संभाल कर रखें।
सूचना आपूर्ति के समय की गणना लोक सूचना अधिकारी द्वारा प्राप्त आवेदन की तिथि से आरंभ होता है।
*शिकायत कब करें*
इस अधिनियम के प्रावधान 18 (1) के तहत यह केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग का कर्तव्य है, जैसा भी मामला हो, कि वे एक व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करें और पूछताछ करें
जो केन्द्रीय सूचना लोक अधिकारी या राज्य सूचना लोक अधिकारी के पास अपना अनुरोध जमा करने में सफल नहीं होते, जैसा भी मामला हो, इसका कारण कुछ भी हो सकता है कि उक्त अधिकारी या केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी, इस अधिनियम के तहत नियुक्त न किया गया हो जैसा भी मामला हो, ने इस अधिनियम के तहत अग्रेषित करने के लिए कोई सूचना या अपील के लिए उसके आवेदन को स्वीकार करने से मना कर दिया हो जिसे वह केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी धारा 19 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट राज्य लोक सूचना अधिकारी के पास न भेजे या केन्द्रीय सूचना या आयोग अथवा राज्य सूचना आयोग में अग्रेषित न करें,जैसा भी मामला हो।
जिसे इस अधिनियम के तहत कोई जानकारी तक पहुंच देने से मना कर दिया गया हो। ऐसा व्यक्ति जिसे इस अधिनियम के तहत निर्दिष्ट समय सीमा के अंदर सूचना के लिए अनुरोध या सूचना तक पहुंच के अनुरोध का उत्तर नहीं दिया गया हो।
जिसे शुल्क भुगतान करने की आवश्यकता हो, जिसे वह अनुपयुक्त मानता / मानती है।
जिसे विश्वास है कि उसे इस अधिनियम के तहत अपूर्ण, भ्रामक या झूठी जानकारी दी गई है।
इस अधिनियम के तहत अभिलेख तक पहुंच प्राप्त करने या अनुरोध करने से संबंधित किसी मामले के विषय में।
*अध्याय 1️⃣6️⃣*
*प्रसार भारती और संबंधित अधिनियम:-*
*परिचय :*
प्रसार भारती (ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया के नाम से भी जानते हैं) भारत की एक सार्वजनिक प्रसारण संस्था है। इसमें मुख्य रूप से दूरदर्शन एवं आकाशवाणी शामिल हैं।
प्रसार भारती का गठन 23 नवंबर, 1997 प्रसारण संबंधी मुद्दों पर सरकारी प्रसारण संस्थाओं को स्वायत्तता देने के मुद्दे पर संसद में काफी बहस के बाद किया गया था। संसद ने इस संबंध में 1990 में एक अधिनियम पारित किया लेकिन इसे अंततः 15 सितंबर 1997 में लागू किया गया।
*प्रसार भारती कानून*
रेडियो और दूरदर्शन को स्वायत्त देने वाले वर्तमान प्रसार भारती कानून का मूल नाम प्रसार भारती (भारती प्रसारण निगम) विधान 1990 था। इसमें कुल चार अध्याय थे जो कुल 35 धाराओं उपधाराओं में बंटे थे। अधिनियम के अनुसार रेडियो – दूरदर्शन का प्रबंधन एक निगम द्वारा किया जायेगा और यह निगम एक 15 सदस्यीय बोर्ड (परिषद) द्वारा संचालित होगा। परिषद में एक अध्यक्ष, एक कार्यकारी सदस्य, एक कार्मिक सदस्य, छह अंशकालिक सदस्य, एक –एक पदेन महानिदेशक (आकाशवाणी और दूरदर्शन), सूचना और प्रसारण मंत्रालय का एक प्रतिनिधि और कर्मचारियों के दो प्रतिनिधियों का प्रावधान था। अध्यक्ष व अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी।
प्रावधानों के अनुसार यह प्रसार भारती बोर्ड सीधे संसद के प्रति उत्तरदायी होगा और साल में एक बार यह अपनी वार्षिक रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत करेगा। अधिनियम में प्रसार भारती बोर्ड की स्वायत्ता के लिये दो समितियों का भी प्रावधान था – संसद समिति और प्रसार परिषद। संसदीय समिति में लोक सभा के 15 और राज्य सभा के 7 सदस्य होंगे जबकि प्रसार भारती परिषद में 11 सदस्य होंगे जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे।
*अधिनियम के अनुसार प्रसार भारती के निम्न उद्देश्य*
देश की एकता और अखंडता तथा संविधान में वर्णित लोकतंत्रात्मक मुल्यों को बनाये रखना।
सार्वजनिक हित के सभी मामलों की सत्य व निष्पक्ष जानकारी,उचित तथा संतुलित रुप में जनता को देना।
शिक्षा तथा साक्षरता की भावना का प्रचार–प्रसार करना।
विभिन्न भारतीय संस्कृतियों व भाषाओं के पर्याप्त समाचार प्रसारित करना।
स्पर्धा बढ़ाने के लिये खेल–कूद के समाचारों को भी पर्याप्त स्थान देना।
महिलाओं की वास्तविक स्थिति तथा समस्याओं को उजागर करना।
युवा वर्ग की आवश्यकताओं पर ध्यान देना।
छुआछूत–असमानता तथा शोषण जैसी सामाजिक बुराईयों का विरोध करना और सामाजिक न्याय को प्रोत्साहन देना।
श्रमिकों के अधिकार की रक्षा करना।
बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना।
*अध्याय 1️⃣7️⃣*
*प्रसारण:नीति और संबंधित कानून*
भारत सरकार के द्वारा 19दिसम्बर 1996 को जारी एक जनसूचना के अनुसार बिना लाइसेंस के कोई भी व्यक्ति या संस्था ,डी.टी.एच् का इस्तेमाल नहीं करेगी |लेकिन इसका उल्लंघन करने पर इसके लिए कोई दंड का प्रावधान नहीं किया गया |
प्रसारण से संबंधित ऐसे ही और अनेक मामले है जिनकों विनियमित करने के लिए एक समग्र प्रसारण नीति की जरुरत काफी लम्बे समय से महसूस की जा रही थी |ऐसे मामलों से संबंधित प्रावधानों को प्रसारण विधेयक 1997 में समाविष्ट किया गया है |
*प्रसारण निति की आवश्यकता*
प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विदेशी निवेश की मात्रा और व्यवस्था |
टेलीविजन चैनलों की अपलिकिंग
डायरेक्ट टू होम की व्यवस्था |
माइक्रोवेव मल्टीपॉइंट डिस्ट्रीब्यूशन का अधिकार |
केबल टेलीविजन का प्रचालन |
विदेशी उपग्रह प्रसारण सेवा |
टेलीविजन चैनलों पर अश्लीलता |
*मूल प्रसारण विधेयक*
प्रसारण विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के उस अदालत (सन1995) पर आधारित है जिसमें कहा गया है की :-
“देश में प्रसारण व्यवस्था के नियमन के लिए कोई प्राधिकरण होना चाहिए और प्रसारण तरंगों पर एक ही अधिकार नहीं हो सकता
*यह विधेयक कुल 6 खण्डों में विभाजित है*
विदेशी सैटेलाइट टेलीविजन के फैलाव और असर को देखते हुए सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने 1991 में वर्धन कमेटी का गठन किया. यूं इसका मकसद था 1990 के प्रसार भारती एक्ट की फिर से जांच करना. संयुक्त मोर्चा सरकार ने आगे बढ़कर राष्ट्रीय मीडिया नीति बनाए जाने की वकालत की. मई 1997 में संसद में प्रसारण बिल पेश किया गया. इस बिल से जुड़ी एक अहम बात सुप्रीम कोर्ट का 1995 का निर्देश है, जिसमें कहा गया था कि वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं. सरकार को वायुतरंगों के इस्तेमाल को विनियमित करने और नियंत्रित करने के लिए समाज के सभी वर्गों और रुचियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक स्वतंत्र स्वायत्त सार्वजनिक संस्था का गठन करना चाहिए. 23 नवंबर 1997 को प्रसार भारती अस्तित्व में आया. ये एक वैधानिक स्वायत्त संस्था बताई गई जो देश का सार्वजनिक प्रसारणकर्ता भी था. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन इसके अधीन आ गये. कागज पर तो स्वायत्तता आ गई लेकिन पर्दे के पीछे डोर केंद्र सरकार के हाथों में रही.
*अध्याय 1️⃣8️⃣*
*मीडिया संबंधी अन्य कानून:-*
*संसदीय कार्यवाही (प्रकाशन का संरक्षण) विधेयक ,1977*
यह अधिनियम मूल रूप से आपातकाल के दौरान 8 दिसम्बर 1975 को एक अध्यादेश द्वारा लाया गया था |आपातकाल हटने पर 1977 में यह अध्यादेश भी वापस ले लिया गया |सन 1977 में ही जनता पार्टी की सरकार कुछ संसोधनों के बाद इस अध्यादेश को पुनः लागु कर दिया गया
इस कानून के द्वारा ,मीडियाकर्मी को संसद या राज्य विधानमंडलो की कार्यवाही के प्रकाशन /प्रसारण के अधिकार को वैधानिक संरक्षण भी प्रदान किया गया है इसे फिरोज गाँधी कानून भी कहा जाता है
संसदीय कार्यवाही से संबंधित प्रकाशित या प्रसारित समाचार |
पत्रकारों को संसद ,सांसद और विधयाकों के विशेषाधिकार का हनन नहीं करना चाहिए |
संसद में दिए गए भाषणों या खुल्लम-खुल्ला आरोपों के अंश भी प्रकाशित /प्रसारित किये जा सकते है लेकिन शर्त यह है कि इसका उद्धेश्य मात्र प्रेस-रिपोर्टिंग ही होना चाहिए
सदन के किसी गोपनीय सत्र की कार्यवाही प्रकाशित नहीं की जा सकती
*पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम 1955*
पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले शब्द-पहेलियों की आड़ में चलने वाले जुए पर अंकुश लगाने के लिए यह अधिनियम लाया गया था |यह कानून इन पहेलियों/प्रतियोगताओं पर अंकुश लगाने के लिए न होकर ,उन्हें नियंत्रित व नियमित करने हेतु था | इन प्रतियोगताओं में क्रास वर्ड पहेली,रिक्त स्थानों में शब्द पूर्ति प्रतियोगिता ,चित्र पहेली पुरस्कार आदि आते है |
*इन अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार*
एक हजार से अधिक रूपये का पुरस्कार प्रतिग्ताओं का विज्ञापन तथा प्रकाशन वर्जित है |
यदि जरुरत समझे तो लाइसेंस अधिकारी ,अनुमति देने से इंकार कर सकता है |
अधिनियम में वर्णित पुरस्कार प्रतिग्ताओं का पूरा हिसाब रखे और इसका विवरण संबंधित लाइसेंस प्राधिकरण को भी भेजें |
बिना लाइसेंस के छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं को सरकार द्वारा जब्त किया जा सकता है |
पुस्तक और समाचार पत्र परिदान अधिनियम, 1954
इस अधिनियम के अंतर्गत प्रकाशकों पर यह कानूनी जिम्मेदारी डाली गयी है कि वे अपनी पुस्तकों या समाचार पत्रों की एक-एक प्रति भारत सरकार द्वारा अधिसूचित सार्वजनिक पुस्तकालयों को मुफ्त या अपने खर्च पर दें| उल्लंघन पर 50000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है|
*औषधि और चमत्कारिक उपचार अधिनियम 1954*
इस अधिनियम का उद्देश्य लोगों को तथाकथिक चमत्कारी दवाओं और उपचारों जैसे मंत्र तंत्र, कवच और जादू होने के प्रयोग के संभावित दुष्प्रभावों स बचाना है| इसमें कुछ प्रकार के विज्ञापनों को नियंत्रित करने और कुछ प्रयोजनों की कथित औषधियों के विज्ञापन पर रोक लगाने के उपबंध किये गए हैं| अधिनियम की धारा ३ के अंतर्गत किसी ऐसे विज्ञापन के प्रकाशन में लगा होना अपराध है जिससे यह धारणा बनती हो कि इस औषधि को
*(1) स्त्रियों का गर्भपात करने या गर्भधारण को रोकने*
*(2) यौन आनंद के लिए व्यक्तियों की क्षमता बनाये रखने या बढाने*
*(3) स्त्रियों के मासिक धर्म के विकारों को ठीक करने के लिए प्रयोग में लायी जा सकती है*
अनुसूची में 54 प्रकार के रोग, विकार या दशाओं को शामिल किया गया है| धारा 4 के अंतर्गत उस विज्ञापन के प्रकाशन में भाग लेना अपराध है|
*(1) जिससे विज्ञापित औषधि के सम्बन्ध में कोई झूठी धारणा सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से बनती हो*
*(2) उस औषधि के सम्बन्ध में कोई झूठा दावा किया गया हो या*
*(3) जो महत्वपूर्ण बातों में झूठा या भ्रामक हो*
धारा 5 के अंतर्गत चमत्कारी उपचार का धंधा करने वालों द्वारा ऐसे विज्ञापन लेना अपराध है|
धारा 6 के अंतर्गत ऐसे दस्तावेजों का आयात-निर्यात भी अपराध है| इसके उल्लंघन पर 6 मास का कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकता है| पुनः दोष सिद्ध होने पर 1 वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जाएगा|
*नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876*
ड्रमैटिक एक्ट 1876 यानि ‘नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876’, 16 दिसम्बर 1876 को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के द्वारा लाया गया था। अन्य अधिनियमों के भांति इस अधिनियम में भी दो भाग है। प्रथम भाग में अधिनियम में जो धाराएँ हैं उनकी सूची और दूसरे भाग में धाराओं के अंतर्गत प्रावधान वर्णित है। इस अधिनियम मे कुल 12 धाराएँ हैं।
*बालक अधिनियम, 1960*
यह अधिनियम बाल अपराधियों के सुधार और अच्छे नागरिक बनाने के उद्देश्य से बनाया गया है| धारा 36(1) के अंतर्गत समाचार पत्रों पर, पत्रिकाओं पर किसी बच्चे के बारे में चल रही जांच के सिलसिले में बच्चे का नाम? पता? उसके स्कूल का नाम या ऐसा विवरण जिससे उसकी पहचान हो सके प्रकाशित करना या उसकी तस्वीर छापना वर्जित है| इसके उल्लंघन पर 1000 रूपये तक का जुर्माना हो सकता है|
*भारतीय डाकघर अधिनियम, 1898*
इस अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत अभद्र या अश्लील सामग्री को डाक से भेजना वर्जित है|इसी प्रकार ऐसी डाक को, जिस पर या जिसके लिफाफे पर अभद्र, अश्लील, राजद्रोहात्मक,निन्दात्मक, धमकाने वाले या अत्यंत उत्तेजक शब्द, चिन्ह या डिजाइन हो, भेजना भी अवैध है|ऐसे समाचार पत्रों, पुस्तकों, पैटर्न, या नमूना पैकेटों को डाक तार महापाल द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा उसमें अश्लील या अभद्र सामग्री होने के संदेह पर रोका या खोला जा सकता है तथा उसका निपटान जैसे केंद्र सरकार चाहे वैसे किया जा सकता है|
जो पत्र, प्रेस और पुस्तक पंजियन अधिनियम 1867 के अधीन नियमों के अनुसार मुद्रित या प्रकाशित नहीं होते, उन्हें डाक से प्रेषित नहीं किया जा सकता| यदि प्रेषित किया जाता है तो इन्हें रोककर राज्य सरकार द्वारा इस विषय में नियुक्त अधिकारी को दिया जा सकता है|
*अश्लीलता धारा 292*
धारा 292 अश्लील लेखन की बिक्री को अपराध बताती है| इसके प्रावधान के उल्लंघन के अपराधी को पहली बार दोष सिद्ध होने पर २ वर्ष तक का कारावास और 2000 रुपया जुर्माना तथा पुनः दोष सिद्ध होने पर 5 वर्ष तक का कारावास और 5000 तक का जुर्माना हो सकता है
*धारा 293: तरुणों में अश्लील वस्तुओं का विक्रय*
इस धारा के अधीन 20 वर्ष से कम आई के युवाओं को अश्लील वस्तुओं की बिक्री करने, भाड़े पर देने, वितरित, प्रदर्शित, परिचालित या पेश करने या ऐसा करने का प्रयत्न करने वालों के लिए अधिक कदा कानून बना दिया गया है| प्रथम दोष सिद्ध होने पर अपराधी को ३ वर्ष तक के साधारण या सश्रम कारावास और 2000 रूपये तक के जुर्माने से तथा पुनः दोष सिद्ध होने पर ७ वर्ष तक के कारावास और ५००० रुपये तक के जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है|
*अध्याय 1️⃣9️⃣*
*प्रेस की आचार संहिता:-*
भारतीय प्रेस परिषद् और भी अनेकों मीडिया संगठन ने समय –समय पर पत्रकारिता के लिए बहुत सारे आचार-संहिता का निर्माण किया है ,फिर भी सभी लोगों के आचार-संहिता को पढने के बाद एक सर्वव्यापी प्रेस की आचार-संहिता इस प्रकार है
पत्रकार को किसी भी विचारधारा से प्रभावित होकर खबर का प्रकाशनया प्रसारण नहीं करना चाहिए। पत्रकार को हर समय न्यायनिष्ट और निष्पक्ष रहना चाहिए।
हमारे देश में जाति और धर्म के नाम पर हमेशा विवाद होता रहता है,कई बार तो दंगा की भी नौबत आ जाती है। अत: एक पत्रकारको खबर का प्रकाशन और प्रसारण करते समय समय विशेष सावधानी और निष्पक्षता बरती जाये। किसी भी प्रकार से जाति या धर्म को लेकर टिका-टिप्पणी नहीं करना चाहिए।
खबर की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। खबर जो है ठीक वैसे ही पेश करना चाहिए। समाचारों में तथ्यों को तोडा मरोड़ा न जाये न कोई सूचना छिपायी जाये।
व्यावसायिक गोपनीयता का निष्ठा से अनुपालन का ध्यान रखना चाहिए।
पत्रकारिता एक मिशन है अत: इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत हित साधने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। प्राय: कई ऐसे पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान पत्रकारिता को ढाल बनाकर उसके आड़ में गलत धंधा करते हैं। खुद को पत्रकार बताकर नियम-कानून की अवहेलना करना या मनमानी करना भी अपराध की श्रेणी में आता है।
पत्रकार अपने पद और पहुंच का उपयोग गैर पत्रकारीय कार्यों के लिए न करें। उदाहरण के लिए- प्राय: ऐसा देखा जाता है कि कई बार ट्रैफिक नियम का पालन ना करने पर जब पत्रकार को दंडित किया जाता है तो वह खुद को प्रेस से बताकर अपने पद का दुरुपयोग करता है।
पत्रकारिता पर कई बार पेड न्यूज जैसे दाग लग चुके हैं। अत: पत्रकारिता की मर्यादा का ध्यान रखते हुए एक पत्रकार को रिश्वत लेकर समाचार छापना या न छापना अवांछनीय,अमर्यादित और अनैतिक है।
हर व्यक्ति की इज्जत उसकी निजी संपत्ति होती है। जिसपर सिर्फ उसी व्यक्ति का अधिकार होता है किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अफवाह फैलाने के लिए पत्रकारिता का उपयोग नहीं किया जाये। यह पत्रकारिता की मर्यादा के खिलाफ है। अगर ऐसा समाचार छापने के लिए जनदबाव हो तो भी पत्रकार पर्याप्त संतुलित रहे।
कुछ साल पहले राष्ट्रपति एपीजे अव्दुल कलाम के हस्ताक्षर से एडीटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने एक पत्रकार व्यवहार संहिता भी जारी की थी। इसमें भी काफी मनन के बाद कई बिंदुओं को शामिल किया गया था। कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हैं-
पर्याप्त समय सीमा के तहत पीड़ित पक्ष को अपना जवाब देने या खंडन करने का मौका दें।
किसी व्यक्ति के निजी मामले को अनावश्यक प्रचार देने से बचें।
किसी खबर में लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए उसमें अतिश्योक्ती से बचें।
निजी दुख वाले दृश्यों से संबंधित खबरों को मानवीय हित के नाम पर आंख मूंद कर न परोसा जाये।मानवाधिकार और निजी भावनाओं की गोपनीयता का भी उतना ही महत्व है।
धार्मिक विवादों पर लिखते समय सभी संप्रदायों और समुदायों को समान आदर दिया जाना चाहिए।
अपराध मामलो में विशेषकर सेक्स और बच्चों से संबंधित मामले में यह देखना जरूरी है कि कहीं रिपोर्ट ही अपने आप में सजा न बन जाये और किसी जीवन को अनावश्यक बर्बाद न कर दे।
चोरी छिपे सुनकर (और फोटो लेकर) किसी यंत्र का सहारा लेकर,किसी के निजी टेलीफोन पर बातचीत को पकड़ कर,अपनी पहचान छिपा कर या चालबाजी से सूचनाएं प्राप्त नहीं की जायें। सिर्फ जनहित के मामले में ही जब ऐसा करना उचित है और सूचना प्राप्त करने का कोई और विकल्प न बचा हो तो ऐसा किया जाये।
कुछ ऐसी बातें हैं जिससे पत्रकार को फिल्ड में या डेस्क पर काम करते वक्त हमेशा दो-चार होना पड़ता है, इसलिए उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखने के साथ-साथ एक पत्रकार को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि–
खबर,विजुअल या ग्राफिक्स में रेप पीड़िता का नाम, फोटो या किसी तरह का कोई पहचान ना हो। फोटो को ब्लर करवाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
न्यायालय को इस देश में सर्वश्रेष्ठ माना गया है इसलिए न्यायालय की अवहेलना नहीं होनी चाहिए।
देश हित एक पत्रकार की प्राथमिकता होती है अत: पत्रकार को देश के रक्षा और विदेश नीति के मामले में कवरेज करते वक्त देश की मर्यादा का हमेशा ध्यान रखना चाहिए
न्यायालय जब तक किसी का अपराध ना सिद्ध कर दे उसे अपराधी नहीं कहना चाहिए इसलिए खबर में उसके लिए आरोपी शब्द का इस्तेमाल करें। अगर कोई नाबालिग अपराध करता है तो उस आरोपी का विजुअल ब्लर करके ही चलाना चाहिए।
*अध्याय 2️⃣0️⃣*
*विज्ञापन की भारतीय आचार- संहिता:-*
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सन 1980 में समूचे भारतवर्ष में एक विज्ञापन निति लागु की जो देश भर की सभी पत्र-पत्रिकाओं पर सामान रूप से लागू होती है |यह नीति सही तरीके से लागू हो रही है या नहीं ,इसकी देख-रेख दृश्य प्रचार निदेशालय द्वारा किया जाता है
विज्ञापन इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह देश की विधि के अनुरूप हो और लोगों की नैतिकता, शालीनता और धार्मिक भावनाओं पर आक्षेप न करता हो ।किसी भी ऐसे विज्ञापन के लिए अनुमति नही दी जाएगी जो
*किसी प्रजाति, जाति, रंग, धर्म और राष्ट्रीयता का उपहास करता हो*
*भारत के संविधान के किसी निर्देशक सिद्धांत किसी अन्य उपबंध के विरुद्ध हो लोगों को अपराध की ओर बढ़ावा देता है या अशान्ति, हिंसा या कानून भंगकरने को बढ़ावा देता है अथवा किसी भी प्रकार से हिंसा या अश्लीलता को महिमामंडित करता है*
*आपराधिक भावना को वांछनीय बतलाता है*
*विदेशी राज्यों के साथ् मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है*
*राष्ट्रीय प्रतीक या संविधान के किसी भाग या किसी व्यक्ति या किसी राष्ट्रीय नेता या राज्य के उच्चाधिकारी के व्यक्तित्व का अनुचित लाभ उठाता हो*
*सिगरेट और तम्बाकू उत्पादों, मदिरा, शराब और अन्य मादक पदार्थों के बारे में है या उन्हें बढ़ावा देता है *महिलाओं के चित्रण में सभी नागरिकों की स्थिति एवं अवसर की समानता तथा व्यक्तिगत मान मर्यादा की संवैधानिक गारंटी काउल्लंघन करता है विशेषकर, किसी भी ऐसे विज्ञापन की अनुमति नहीं दी जाएगी जिसमें महिलाओं की अपमानजनक छविप्रस्तुत की गई हो महिलाओं का चित्रांकन इस ढंग से कदापि नहीं किया जाना चाहिए जो निष्क्रियता एवं दब्बु स्वभाव पर बल देता हो और परिवार एवं समाज में उनकी अधीनस्थ और गौण भूमिका को प्रोत्साहित करता हो*

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