*🔹अछूत 🔹*     *वे कौन थे ❗और अछूत कैसे बन गए ❓: -                       - NINE ONE TIMES

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27/02/2020

*🔹अछूत 🔹*     *वे कौन थे ❗और अछूत कैसे बन गए ❓: -                      

                                                                               डॉ बाबा साहब  बी आर अम्बेडकर*                                                                     🤷‍♂️🤷‍♀️
*डॉ बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर द्वारा लिखित यह पुस्तक  अछूतों की उत्पत्ति  उनकी दुर्दशा  उनके सामाजिक बहिष्कार जैसे तमाम पहलुओं की व्याख्या करती है मूल रूप से यह अंग्रेजी में लिखी गयी  यह पुस्तक अंग्रेजी में तो इन्टरनेट पर उपलब्ध है लेकिन पिछले कुछ सालों से ढूढने पर भी हिंदी में यह पुस्तक कही नहीं मिलती थी लेकिन अब इस पुस्तक को हिंदी में दो ब्लोगों के द्वारा मिला है यह पुस्तक अलग-अलग भाग वा अध्यायों के साथ प्रस्तुत है उम्मीद करता हूं दोस्तों आपको पसंद आएगा*                                                                💁‍♂️💁‍♀️


*🔸प्रस्तावना🔸:*
*🔸भाग एक🔸: तुलनात्मक सर्वेक्षण*
अध्याय 1: गैर हिन्दुओं में छुआछूत
अध्याय 2 : हिन्दुओं में छुआछूत
*🔸भाग दो: आदतन समस्या🔸*
अध्याय 3: अछूत गाँव के बाहर क्यों रहते हैं❓
अध्याय 4: क्या अछूत छितरे व्यक्ति हैं❓
अध्याय 5 : क्या ऐसे समानान्तर मामले हैं❓
अध्याय 6: छितरे लोगों की अलग बस्तियां अन्यत्र कैसे विलुप्त हो गयीं❓ 
*🔸भाग तीन: अछूतों की उत्त्पति का पुराना सिद्धांत🔸*
अध्याय 7: छुआछूत की उत्पत्ति का आधार - नस्ल का अंतर
अध्याय 8: छुआछूत की व्यवसायजन्य उत्पत्ति
*🔸भाग चार: अछूतों की उत्पत्ति का नया सिद्धांत🔸*
अध्याय 9 : बौद्धों का अपमान - छुआछूत का मूलाधार
अध्याय 10 : गोमांस भक्षण - छुआछूत का मूलाधार
*🔸भाग पांच: नए सिद्धांत और कुछ कठिन सवाल🔸*
अध्याय 11 : क्या हिन्दू कभी गोमांस नहीं खाते थे❓
अध्याय 12 : गैर ब्राह्मणों ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा ❓
अध्याय 13 : ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने❓
अध्याय 14 : गोमांस भक्षण से छितरे व्यक्ति अछूत कैसे बने ❓
*🔸भाग छै : छुआछूत और इसकी उत्पत्ति की तिथि🔸*
अध्याय 15 : अपवित्र और अछूत
अध्याय 16 : छितरे लोग अछूत कब बने❓                                  *________________________________ ----आगे विस्तार से*                                                                             
*🔸प्रस्तावना🔸:*


*यह पुस्तक मेरी पुस्तक दि शूद्र-हू दे वर एंड हाउ दे केम टु बि दि फ़ोर्थ वर्ण ऑफ़ इंडो आर्यन सोसायटी जिसका प्रकाशन 1946 में हुआ था का अंतः परिणाम है शूद्रों के अतिरिक्त हिंदू सभ्यता ने तीन और वर्णो को जन्म दिया इसके अतिरिक्त किसी और वर्ग के अस्तित्व की ओर वांछित ध्यान नहीं दिया गया है ये वर्ग हैं:*


*1. जरायम पेशेवर कबीले- जिनकी संख्या लगभग दो करोड़ है*
*2. आदिम जातियां - जिनकी संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है*
*3. अछूत - जिनकी संख्या लगभग पाँच करोड़ है*


*इन वर्गों की उत्पत्ति के विषय में अनुसंधान अभी हुआ ही नहीं है इस पुस्तकमें एक सबसे अभागे वर्ग अछूतों की दशा पर प्रकाश डाला गया है अछूतों की संख्या तीनों में सर्वाधिक है उनका अस्तित्व भी सर्वाधिक अस्वाभाविक है फिर भी उनकी उत्पत्ति के विषय में कोई जानकारी इकट्ठी नहीं की गई यह बात पूरी तरह से समझी जा सकती है कि हिंदुओं ने यह कष्ट क्यों नहीं उठाया पुराने रूढि़वादी हिन्दू तो इसकी कल्पना भी नहीं करते कि छुआछूत बरतने में कोई दोष भी है वे इसे सामान्य और स्वाभाविक कहते हैं और न ही इसका उन्हे कोई पछतावा है और न ही उनके पास इसका कोई स्पष्टी करण है नए ज़माने का हिंदू ग़लती का एहसास करता है परंतु वह सार्वजनिक रूप से इस पर चर्चा करने से कतराता है कि कहीं विदेशियो के सामने हिन्दू सभ्यता की पोल न खुल जाय कि यह ऐसी निन्दनीय तथा विषैली सामाजिक व्यवस्था है*


*बाबा साहब की यह पुस्तक मुख्य प्रश्न के सभी पहलुओं पर ही प्रकाश नहीं डालती वरन अस्पृश्यता की उत्पत्ति से सम्बन्धित सभी प्रश्नों पर भी विचार करती है जैसे:- अछूत गाँवो के सिरों पर ही क्यों रहते है❓ गाय का मांस खाने से कोई अछूत कैसे बन गया❓ क्या हिन्दुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया❓ गैर-ब्राह्मणों ने गोमांस भक्षण क्यों त्याग दिया❓ ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने ❓हो सकता है इस पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर पढ़ कर सब के मुँह लटक जायं फिर भी यह पता चलेगा कि यह पुस्तक पुरानी बातों पर नई दृष्टि से विचार करने का प्रयास अवश्य है*


*अछूतों की उत्पत्ति की खोज: करने और तत्सम्बंधी समस्याओ के बारे में मुझे कुछ सूत्र नहीं मिले हैं यह सत्य है कि मैं ऐसा अकेला ही व्यक्ति नहीं हूँ जिसे इस समस्या से जूझना पड़ा है प्राचीन भारत के सभी अध्येताओं के सामने यह कठिनाई आती है*


*यह एक दुःखद बात है किंतु कोई चारा भी नहीं है प्रश्न यह है कि इतिहास का विद्यार्थी क्या करे क्या वह झक मार कर अपने हाथ खड़े कर दे और तब तक बैठा रहे जब तक खोए सूत्र नहीं मिल जाते❓ मेरे विचार में नहीं मैं सोचता हूँ ऐसे मामलों में उसे अपनी कल्पनाशक्ति और अंतःदृष्टिसे काम लेना चाहिये ताकि टूटे हुए सूत्र जुड़ सकें और कोई स्थानापन्न प्राकलन मान लेना चाहिये ताकि ज्ञात तथ्यों और टूटी हुई कडि़यों को जोड़ा जा सके मैं स्वीकार करता हूँ कि हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाने के बजाय मैंने टूटे सूत्रों को जोड़ने के लिए यही मार्ग अपनाया है*


*मेरे आलोचक इस बात पर ध्यान दें कि मैं अपनी कृति को अंतिम मानने का दावा नहीं करता मैं उनसे नहीं कहूँगा कि वे इसे अंतिम निर्णय माने लें मैं उनके निर्णय को प्रभावित नहीं करना चाहता।वे अपना स्वतंत्र निर्णय लें मेरी अपने आलोचकों से यही आकांक्षा है कि वे इस पर निष्पक्ष दृष्टिपात करेंगे।*
*🔸भाग - एक: तुलनात्मक सर्वेक्षण🔸*
*अध्याय 1: गैर हिन्दुओं में छुआछूत:-*
*आदि मानव अशुद्धि के निम्नलिखित कारण समझता था-*
*1. कुछ विशेष घटनाओं का घटना*
*2. कुछ वस्तुओं से सम्पर्क*
*3. कुछ व्यक्तियों से सम्पर्क*
*जीवन की जिन घटनाओं को प्राचीन मनुष्य अपवित्रता का कारण मानता था उनमें* *निम्नलिखित मुख्य थीं 1. जन्म 2. दीक्षा संस्कार 3. वयसंधि 4. विवाह 5.सहवास 6.मृत्यु*


*गर्भवती माताओं को अशुद्ध माना जाता था और उन्हे दूसरों में अशुद्धि फैलाने वाला माना जाता था माता की अपवित्रता बच्चो तक मैं फैलती थी*


*प्रारम्भिक मनुष्य ने यह सीख लिया था कि कुछ वस्तुए पवित्र हैं और कुछ अन्य अपवित्र। यदि कोई व्यक्ति किसी पवित्र वस्तु को छू दे तो यही माना जाता था कि उसने उसे अपवित्र कर दिया*


*इस पवित्रता की भावना का सम्बंध केवल वस्तुओं से नहीं था लोगों के कुछ ऐसे विशिष्ट वर्ग भी थे जो अपवित्र समझे जाते थे कोई व्यक्ति उन्हे छू देता तो वह विशिष्ट व्यक्ति छूत लगा हुआ माना जाता था अजनबी लोगों से मिलना आदिम पुरुष द्वारा छुआछूत का स्रोत माना जाता था* 


*यदि शुद्ध व्यक्ति को किसी सामान्य लौकिक व्यक्ति से दूषित कर दिया गया हो अथवा स्वजाति से ही अपवित्रता हुई हो तो एकांतवास होता ही है सामान्य दूषित व्यक्ति को शुचि से दूर रहना ही चाहिये। सजातीय को विजातीय से दूर रहना चाहिये इस से यह स्पष्ट है कि आदिम काल के समाज में अशुद्धि के कारण पृथक कर दिया जाता था*


*अशुद्धि को दूर करने के साधन पानी और रक्त हैं जो आदमी अशुद्ध हो गया हो उस पर यदि पानी और रक्त के छींटे दे दिये जायं तो वह पवित्र हो जाता है पवित्र बनाने वालों अनुष्ठानों में वस्त्रों को बदलना बालों तथा नाखूनों को काटन पसीना निकालना आग तापना धूनी देना सुगंधित पदार्थों के जलाना और वृक्ष की किसी डाली से झाड़फूंक कराना शामिल है*


*ये अशुद्धि मिटाने के साधन थे किंतु आदिम काल में अशुद्धि से बचने का एक और उपाय भी था वह था एक की अशुद्धि दूसरे पर डाल देना वह किसी दूसरे ऐसे व्यक्ति पर जो पहले से ही वर्जित अथवा बहिष्कृत होता था डाल दी जाती थी*


*इसी तरह प्राचीन समाज की अशुद्धि की कल्पना आदिम समाज की अशुद्धि की कल्पना से कुछ भिन्न नहीं थी*


*प्राचीन रोम में घर की पवित्रता की तरह सारे प्रदेश की प्रदक्षिणा करके बलि देकर प्रादेशिक शुद्धि का संस्कार पूरा होता था वहीं की न्याय पद्धति में यदि शाब्दिक उच्चारण में कोई अशुद्धि रह जाती तो वादी अपना मुकदमा स्वयं ही हार जाता*
*अध्याय 2 : हिन्दुओं में छुआछूत*
*अशुद्धि के बारे में हिन्दुओं और आदिम तथा प्राचीन समाज के लोगों में कोई भेद नहीं है*


*मनु ने जन्म मृत्यु तथा मासिक धर्म को अशुद्धि का जनक स्वीकार किया है मृत्यु से होने वाली अशुचिता व्यापक और दूर दूर तक फैलती थी यह रक्त सम्बंध का अनुसरण करती थी और वे सभी लोग जो सपिण्डक और समानोदक कहते हैं, अपवित्र होते थे जन्म और मृत्यु के अतिरिक्त ब्राह्मण पर तो अपवित्रता के और भी अनेक कारण लागू थे जो अब्राह्मणों पर नहीं शुद्धि के उद्देश्य से मनु ने इस विषय को तीन तरह से लिया है*


*1. शारीरिक अशुद्धि*
*2. मानसिक अथवा मनोवैज्ञानिक*
*3. नैतिक अशुद्धि*


*नैतिक अशुद्धि मन में बुरे संकल्पों को स्थान देने से पैदा होती है उसकी शुद्धि के नियम तो केवल उपदेश और आदेश ही हैं किंतु मानसिक और शारीरिक अशुद्धि दूर करने के लिये जो अनुष्ठान है वे एक ही हैं उनमें पानी, मिट्टी गो मूत्र कुशा और भस्म का उपयोग शारीरिक अशुद्धि को दूर करने में होता है मानसिक अशुद्धि दूर करने में पानी सबसे अधिक उपयोगी है*


*उसका उपयोग तीन तरह से है आचमन, स्नान तथा सिंचन आगे चलकर मानसिक अशुद्धि दूर करने के लिये पंच गव्य का सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान हो गया गौ से प्राप्त पाँच पदार्थों गोमूत्र गोबर दूध दही और घी से इसका निर्माण होता है*


*व्यक्तिगत अशुचिता के अलावा हिन्दुओं का प्रदेशगत और जातिगत अशुद्धि और उसके शुद्धि करण में भी विश्वास रहा है ठीक वैसी ही जैसी प्राचीन रोम के निवासियों में प्रथा प्रचलित थी*


*लेकिन यहीं इतिश्री नहीं हो जाती क्योंकि हिन्दू एक और तरह की छुआछूत मानते हैं कुछ जातियां पुश्तैनी छुआछूत की शिकार हैं इन जातियों की संख्या इतनी है कि बिना किसी की विशेष सहायता के एक सामान्य व्यक्ति के लिये उनकी एक पूरी सूची बना लेना आसान नहीं भाग्यवश 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के अधीन निकाले गये ऑर्डर इन कॉउन्सिल के साथ एक ऐसी सूची संलग्न है*


*इस सूची में भारत के भिन्न भिन्न भागों मे रहने वाली 429 जातियां सम्मिलित हैं जिसका मतलब है कि देश में आज 5 से 6 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके स्पर्श मात्र से हिन्दू अशुद्ध हो जाते हैं हिन्दुओं की यह छुआछूत विचित्र है संसार के इतिहास में इसकी तुलना नहीं है अहिन्दू आदिम या प्राचीन कालिक समाज से अलग इसकी विशेषताए हैं:*


*1. अहिन्दू समाज में यह शुचिता के यह नियम जन्म विवाह मृत्यु आदि के विशेष अवसरोंपर लागू होते थे किंतु हिन्दू समाज में यह अस्पृश्यता स्पष्टतः निराधार ही है*


*2. अहिन्दू समाज जिस अपवित्रता को मानता था वह थोड़े समय रहती थी और खाने पीने आदि के शारीरि्क कार्यों तक सीमित थी। अशुद्धता क समय बीतने पर शुद्धि संस्कार होने पर व्यक्ति पुनः शुद्ध हो जाता था परन्तु हिन्दू समाज में यह अशुद्धता आजीवन की है..जो हिन्दू उन अछूतों का स्पर्श करते हैं वे स्नानादि से पवित्र हो सकते हैं पर ऐसी कोई चीज़ नहीं जो अछूत को पवित्र बना सके ये अपवित्र ही पैदा होते हैं जन्म भर अपवित्र ही बने रहते हैं और अपवित्र ही मर जाते हैं*


*3.अहिन्दू समाज अशुद्धता से पैदा होने वाले पार्थक्य को मानते थे वे उन व्यक्तियों तथा उनसे निकट सम्पर्क रखने वालों को ही पृथक करते थे। लेकिन हिन्दुओ के इअ छुआछूत ने एक समूचे वर्ग को अस्पृश्य बना रखा है*


*4.अहिन्दू उन व्यक्तियों को जो अपवित्रता से प्रभावित हो गये हों कुछ समय के लिए पृथ क कर देते थे मगर हिन्दू समाज का आदेश है कि अछूत पृथक बसें हर हिन्दू गाँव में अछूतों के टोले हैं हिन्दू गाँव में रहते हैं, अछूत गाँव के बाहर टोले में बसते हैं*
*🔸भाग-दो: आदतन समस्या:-🔸*
*अध्याय 3: अछूत गाँव के बाहर क्यों रहते हैं❓*
*स्वाभाविक तौर पर इस बारे में किसी का कुछ सिद्धान्त नहीं है कि अछूत गाँव से बाहर क्यों रहने लगे यह तो हिन्दू शास्त्रों का मत है और यदि कोई इसे सिद्धान्त मान कर उचित कहे तो वह कह सकता है शास्त्रों का मत है कि अंत्यजो को गाँव के बाहर रहना चाहिये*


*मनु का कथन है:*
*चाण्डालों और खपचों का निवास गाँव से बाहर हो उन्हे अपपात्र बनाया जाय उनका धन कुत्ते और गधे हों (10.51.)*


*मुर्दों के उतरन उनके वस्त्र हों वे टूटे बरतनों में भोजन करें उनके गहने काले लोहे के हों और वे सदैव जगह जगह घूमते रहें(10.52.)*


*इस कथन के दो अर्थ लिये जा सकते हैं*
*1. अछूत हमेशा से गाँव के बाहर रहते आये और अस्पृश्यता के कलंक के बाद उनका गाँव में आना निषिद्ध हो गया*
*2. वे मूलतः गाँव के अन्दर रहते थे पर अस्पृश्यता का कलंक लगने के बाद उन्हे गाँव से बाहर किया गया*


*दूसरी सम्भावना बेसिर पैर की कल्पना ही है क्योंकि पूरे भारत वर्ष में गाँव के भीतर बस रहे अछूतों को निकालकर गाँव के बाहर बसाना लगभग असंभव कार्य लगता है यदि संभव होता भी तो इसके लिये किसी चक्रवर्ती राजा की ज़रूरत होती और भारत में ऐसा कोई चक्रवर्ती राजा नहीं हुआ तो इस दूसरी सम्भावना को छोड़ देने पर इस बात पर विचार किया जाय कि अछूत शुरु से ही गाँव के बाहर क्यों रहते थे*


*आदिम समाज रक्त सम्बन्ध पर आधारित कबायली समूह था मगर वर्तमान समाज नस्लों के समूह में बदल चुका है साथ ही साथ आदिम समाज खानाबदोश जातियों का बना था और वर्तमान समाज एक जगह बनी बस्तियों का समूह है इस यात्रा में ही हमारे प्रश्न का उत्तर है*


*आदिम लोग पशुपालन करते और अपने पशुओ को लेकर कहीं भी चले जाते ये बात भी याद रहे कि ये कबीले और जातियां पशुओं की चोरी और स्त्रियों के हरण के लिये आपस में अक्सर युद्ध करते रहते इन युद्धों दौरान जो दल परास्त होता वह टुकड़े टुकड़े हो जाता और इस तरह परास्त हुए लोग छितरे बिखरे हो कर इधर उधर घूमते रहते आदिम समाज में हर व्यक्ति का अस्तित्त्व अपने कबीले से हो कर ही होता था, कोई भी व्यक्ति जो एक कबीले में पैदा हुआ हो वह दूसरे कबीले में शामिल नहीं हो सकता था तो इस तरह से छितरे व्यक्ति (broken man) एक गहरी समस्या के शिकार थे*


*आदिम मानव को जब एक नई संपदा- भूमि का पता चला तो उनका जीवन धीरे धीरे स्थिर हो गया पर सभी घुमन्तु कबीले और जातियां एक ही समय पर स्थिर नहीं हुए कुछ स्थिर हो गये और कुछ घुमन्तु बने रहे तब घुमन्तु लोगों को बसे हुए लोगों की सम्पत्ति देख कर लालच होता और वे उन पर हमला करते जबकि बसे हुए लोग अपना घर बार छोड़कर इन घुमन्तुओ का पीछा करना और मारकाट करना नहीं चाहते थे और वे अपनी रक्षा में कमज़ोर हो गए थे उन्हे कोई ऐसे लोग चाहिये थे जो घुमन्तुओं के आक्रमण में उनकी पहरेदारी करें। दूसरी तरफ़ छितरे लोगों की समस्या थी कि उन्हे ऐसे लोग चाहिये थे जो उन्हे शरण और संरक्षण दे*


*इन दोनों समूहों ने अपनी समस्या को कैसे सुलझाया इसका हमारे पास कोई दस्तावेज़ कोई प्रमाण नहीं है जो भी समझौता हुआ होगा उसमें दो बाते ज़रूर विचारणीय होगीं- एक तो रक्त सम्बन्ध और दूसरी युद्ध नीति। आदिम मान्यता के अनुसार रक्त सम्बन्धी ही एक साथ रह सकते हैं और युद्ध नीति के अनुसार पहरेदार को चाहिये कि वह सीमाओं पर रहें*


*पर इस बात का क्या कोई ठोस प्रमाण है कि अछूत छितरे हुए व्यक्ति ही हैं❓*
*अध्याय 4: क्या अछूत छितरे व्यक्ति हैं❓*
*मेरा उत्तर है हाँ गाँव में बसने वाली जाति और अछूतों की गण देवों की भिन्न्ता ही इसका सर्वश्रेष्ठ प्रमाण होगी पर इस तरह का अध्ययन अनुपलब्ध है*


*भाषा का सहारा लेकर देखें तो अछूतों को दिए गये नाम अन्त्य अन्त्यज अन्त्यवासिन अंत धातु से निकले हैं हिन्दू पण्डितों का कहना है इन शब्दों का अर्थ अंत में पदा हुआ है मगर यह तर्क बेहूदा है क्योंकि अंत में तो शूद्र पैदा हुए हैं जबकि अछूत तो ब्रह्मा की सृष्टि रचना से बाहर का प्राणी है शूद्र सवर्ण है जबकि अछूत अवर्ण है मेरी समझ में अन्त्यज का अर्थ सृष्टि क्रम का अंत नहीं गाँव का अंत है यह एक नाम है जो गाँव की सीमा पर रहने वाले लोगों को दिया गया*


*दूसरा तथ्य महाराष्ट्र की सबसे बड़ी अछूत जाति महारो से सम्बन्धित है इनके बारे में ध्यान देने योग्य है कि*
*1. महाराष्ट्र के हर गाँव के गिर्द एक दीवार रहती है और महार उस दीवार के बाहर रहते हैं*
*2. महार बारी बारी से गाँव की पहरेदारी करते हैं*
*3. महार हिन्दू गाँव वासियों के विरुद्ध अपने 52 अधिकारों का दावा करते हैं जिनमें मुख्य हैं*
*(A). गाँव के लोगों से खाना इकट्ठा करने का अधिकार*
*(B). फ़सल के समय हर गाँव से अनाज इकट्ठा करने का अधिकार*
*(C). गाँव के मरे हुए पशुओ पर अधिकार*
*अनुश्रुति है कि ये अधिकार महारों को बरार के मुस्लिम राजाओं से प्राप्त हुए  इसका मतलब इतना ही हो सकता है कि इन प्राचीन अधिकारों को बरार के राजा ने नए सिरे से मान्यता दी*


*ये तथ्य बहुत मामूली हैं फिर भी इतना तो प्रमाणित करते हैं कि अछूत आरंभ से ही गाँव से बाहर रहते आए हैं*                          *____________________                                                  --------शेष अगले दिन*                   ➡️➡️


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