भारत सरकार और राज्यसरकारे SC ST OBC का आरक्षण 70 साल से लागू नही करना चाहती । SC ST का बॅकलॉग बाकी है । 52 % OBC का आरक्षण केवल 8% भरा है।
सिनियर IAS की पोस्ट लॅटरल एन्ट्री के आधारपर उद्योगपतीयो को दी गयी है।
उत्तराखंड सरकार आरक्षण देना नही चाहती इसलीये वो पहले हायकोर्ट चली गयी और फिर सुप्रीम कोर्ट !
सुप्रीम कोर्ट कहता है आरक्षण स्टेट की मर्जी के उपर है। वो देना चाहे तो दे नही देना चाहे तो ना दे । इसका साफ मतलब है आरक्षण मत दो ।
ये निर्णय संविधान द्रोही है। इसको तुरंत संसद का विशेष सत्र बुलाकर रद्द करना चाहीये और आरक्षण को लागू करना स्टेट के लिए बंधनकारक बनाने वाला कानून बनाना चाहीये । इसके लिए आर्टिकल 16 (4) में इस प्रकार अमेंडमेंट करनी चाहीए ताकी भविष्य में कोई कोर्ट या संसद आरक्षण पर सवाल ना उठाए ।
16(4) का प्रॉव्हिजन अभि इस प्रकार है।
4) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any backward class of citizens which, in the opinion of the State, is not adequately represented in the services under the State
इसमें 'Nothing in this article shall prevent the State from ' की जगह 'It should be mandatory for the state for ' ये शब्द डालने चाहीए
और 'in the opinion of the State'ये शब्द डिलीट कर देने चाहीए
अमेहमेन्ट किया हुआ 16 (4) आर्टिकल इसप्रकार होना चाहीए
16 (4) It should be mandatory for the state for making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any backward class of citizens which is not adequately represented in the services under the State.
इससे रिझर्वेशन देना स्टेट की मर्जीपर निर्भर नही रहेगा !
Sanchit Dhanve
अगर आरक्षण देना स्टेट का विषय है तो न्यायपालिका में आरक्षण देना भी स्टेट का विषय है.
क्या स्टेट के मतानुसार न्यायपालिका में एससी एसटी ओबीसी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व ( Adequate Representation) है. इस पर बहस होनी चाहीये. जिसकी दितनी संख्या भारी उतनी उसकी भागीदारी. इसिलिये जातीय जनगणना होनी चाहीये.

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