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03/02/2020

अनुसूचित जाति बनी कैसे  ?

सन् उन्नीस सौ इकत्तीस (1931) में जनगणना आयुक्त श्री मी.जे. एच.हट्टन ने सम्पूर्ण भारत की प्रथम जनगणना करवायी । परन्तु    भारत में 1108 जातियाँ हिन्दू धर्म से बाहर पायी गयी । हट्टन कमेटी द्वारा पाया गया कि ये ब्राह्मणों के लेखकों ने अस्पृश्य जाति घोषित कर रखी हैं और ये भारतीय मूल की जातियाँ हैं जो कि कुल जनसंख्या का 87%भाग है । हट्टन कमेटी द्वारा पाया गया कि ये हिन्दू धर्म से बहिष्कृत जातियाँ हैं इसलिए इन जातियों को बहिष्कृत जाति के लोग कहा जाता है । उस समय प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने देखा कि ये एक स्वतंत्र वर्ग है जो कि हिन्दू धर्म में समाविष्ट नहीं है । इसलिए इनकी एक अनुसूची बनाकर भारत की जनसँख्या में समाविष्ट किया जाए । इसप्रकार भारत के प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने इन भारतीय मूलवासियों को अनुसूचित जाति कहा । इसी के आधार पर भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जाति अध्यादेश 1935 बनाकर कुछ सुविधाओं के साथ जोड़ा । इसी आधार पर भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जाति अध्यादेश 1936 ज़ारी कर आरक्षण सुविधाओं का प्रावधान किया गया है । सन् 1936 के इस अध्यादेश को आगे चलकर भारतीय संविधान में सन् 1950 में अनुच्छेद 340 पिछड़ी जाति ,अनुच्छेद 341अनुसूचित जाति, अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है ।
🙏📖☝भारत की मूलवासियों की जातियों का इतिहास यही कहता है कि यह भारत वर्ष में 4 वीं ईसा पूर्व से वृहद्रथ के शासनकाल के बाद और पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में बहिष्कृत की गयी भारतीय मूल की जातियाँ सन् 1931 की जनगणना में पहली बार सूचीबद्ध किया गया है । इसी सूची का समुचित क्रम (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछडी जाति, अल्पसंख्यक समुदाय) ही 87% डी एन ए के अनुसार भारतीय मूलनिवासी है । 


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