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12/02/2020

*आज भी चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत पर टिका विज्ञान*

                                                   ‌                                                     *‌चार्ल्स डार्विन परिचय    बीगल जहाज़ पर यात्रा    क्रमविकास का सिद्धांत:-*
                                                                                            *पूरा नाम:-  चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन*
*अन्य नाम:- चार्ल्स डार्विन*
*जन्म :- 12 फ़रवरी, 1809*
*जन्म भूमि :- इंग्लैंड*
*मृत्यु :_ 19 अप्रैल, 1882*
*मृत्यु स्थान:-  डाउन हाउस, डाउन, केंट, इंग्लैंड*
*कर्म-क्षेत्र:-  वैज्ञानिक*
*खोज:-  क्रमविकास के सिद्धांत*
*पुरस्कार-उपाधि रॉयल मेडल (1853), वोलस्टन मेडल (1859), कोप्ले मेडल (1864)*
*चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन ने एच. एम. एस. बीगल की यात्रा के 20 साल बाद तक कई पौधों और जीवों की प्रजातियां का अध्ययन किया और 1858 में दुनिया के सामने 'क्रमविकास का सिद्धांत' दिया*
*अन्य जानकारी चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन को प्रजातियों के विकास की नयी अवधारणाओं के जनक के रूप में जाना जाता है*


*चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (अंग्रेज़ी:Charles Robert Darwin जन्म- 12 फ़रवरी, 1809, इंग्लैंड मृत्यु- 19 अप्रैल, 1882, डाउन केंट इंग्लैंड) महान् प्रकृतिवादी वैज्ञानिक थे जिन्होंने 'क्रमविकास के सिद्धांत' को दुनिया के सामने रखा उन्होंने प्राचीन समय से इंसानों और अन्य जीवों में होने वाले विकास को अपने शोध में बहुत ही आसान तरीके से बताया था चार्ल्स डार्विन एक बहुफलदायक लेखक भी थे*
*परिचय:-*
*चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फ़रवरी, 1809 को इंग्लैंड में हुआ था। इनका पूरा नाम चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन था। ये अपने माता-पिता की पांचवी संतान थे डार्विन एक बहुत ही पढ़े लिखे और अमीर परिवार में पैदा हुए थे उनके पिता राबर्ट डार्विन एक जाने माने डॉक्टर थे। डार्विन जब महज 8 साल के थे तो उनकी माता की मृत्यु हो गई थी चार्ल्स डार्विन, वो वैज्ञानिक जिसने बताया इंसान बंदर की औलाद है*


*चार्ल्स डार्विन का मत था कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन द्वारा अपना विकास करती है* *विकासवाद कहलाने वाला यही सिद्धांत आधुनिक जीवविज्ञान की नींव बना. डार्विन को इसीलिए मानव इतिहास का सबसे बड़ा वैज्ञानिक माना जाता है*
*डार्विन के माता-पिता संपन्न लोग थे चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने लेकिन बेटे को तो शौक था शिकार का घुड़सवारी का प्रकृति को देखने-समझने का महत्वाकांक्षा से अधिक वह उत्साह से ओतप्रोत था. मात्र 22 साल का था, जब दिसंबर 1831 में उसे बीगल नाम के जहाज से दूर दुनिया में जाने और उसे देखने का मौका मिला*


*युवा चार्ल्स ने मौका हाथ से जाने नहीं दिया. हालांकि शुरू-शुरू में समुद्ररोग से, यानी सिरदर्द और मितली से, उसका जीना दूभर हो गया था. जहाज के कप्तान को शक होने लगा था कि लड़का अंत तक टिक भी पाएगा या नहीं. लड़का टिका रहा, पांच साल तक टिका रहा*


*क्रांतिकारी सिद्धांत*


*रास्ते में जहां-जहां जहाज से उतरा, वहां के जीव-जंतुओं पेड़-पौधों, पत्थरों-चट्टानों, कीट-पतंगों को जांचता-परखता और उनके नमूने जमा करता रहा. अपने अवलोकनों और विश्लेषणों से इस निष्पत्ति पर पहुंचा कि सभी प्रजातियां मूलरूप से एकही जाति की उत्पत्ति हैं. परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप को ढालने की विवशता प्रजाति-विविधता को जन्म देती है. 1859 में प्रकाशित अपनी किताब में डार्विन ने यही उद्घोष किया है. सिद्धांत था तो बहुत नया और क्रांतिकारी, लेकिन सारी कसौटियों पर सही उतरता रहा और आज विज्ञान का एक सर्वमान्य सिद्धांत बन गया है*



*1859 में प्रकाशित हुई किताब 'द ओरिजिन ऑफ स्पीशीस'*
*डीएनए कोड से पुष्टि*


*आनुवंशिक कोडधारी डीएनए की ऐंठनदार सीढ़ी जैसी संरचना होती है, जिसे डबलहेलिक्स स्ट्रक्चर कहते हैं. इसके सहखोजी जेम्स वॉटसन मानते हैं कि आनुवंशिकी भी हर कदम पर डार्विन की ही पुष्टि करती लगती है, "मेरे लिए तो चार्ल्स डार्विन इस धरती पर जी चुका सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है*


*जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस* *क्रिक ने 1953 मे एक ऐसी खोज की, जिससे चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित अधिकतर सिद्धांतों की पुष्टि होती है. उन्होंने जीवधारियों के भावी विकास के उस नक्शे को पढ़ने का रासायनिक कोड जान लिया था, जो हर जीवधारी अपनी हर कोषिका में लिये घूमता है. यह नक्शा केवल चार अक्षरों वाले डीएनए कोड के रूप में होता है. अपनी खोज के लिए 1962 में दोनो को चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला*


*एडवर्ड ऑसबर्न विल्सन आजकल के सबसे जानेमाने विकासवादी वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं और वे भी डार्विन के आगे सिर झुकाते हैं, हर युग का अपना एक मील का पत्थर होता है. पिछले 200 वर्षों के आधुनिक जीवविज्ञान का मेरी दृष्टि में मील का पत्थर है 1859, जब जैविक प्रजातियों की उत्पत्ति के बारे में डार्विन की पुस्तक प्रकाशित हुई थी. दूसरा मील का पत्थर है 1953, जब डीएनए की बनावट के बारे में वॉटसन और क्रिक की खोज प्रकाशित हुई*



*1831 में डार्विन बीगल जहाज से गालापोगोस द्वीपों पर पहुंचे.*
*डार्विन तथा वॉटसन और क्रिक के बीच एक और ऐसा वैज्ञानिक रहा है, जिसने आधुनिक जीवविज्ञान पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. वह था ऑस्ट्रिया का एक ईसाई भिक्षु ग्रेगोर मेंडल. वह डार्विन का समकालीन था. विज्ञान-इतिहासकार एरन्स्ट पेटर फिशर बताते हैं कि मेंडल मटर की नस्लों के बीच वर्णसंकर के प्रयोग कर रहा था और जो कुछ नया देखता-पाता था, उससे डार्विन को भी अवगत कराता था, "डार्विन आनुवंशिकी के नियम नहीं जानता था. यह तो मालूम है कि डार्विन को इस समाचारपत्र की एक प्रति मिली थी, लेकिन यह भी मालूम है कि उसने उसे खोला ही नहीं था. यानी, उसे नहीं पता था कि किन नियमों के अनुसार आनुवंशिक गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलते हैं और न ही इस बारे में कोई कल्पना कर सकता था*
*ग्रेगोर मेंडल तथा वॉटसन और क्रिक की जोड़ी के कार्यों की बलिहारी से कुलिंग पक्षियों वाली वह पहेली भी हल की जा सकी, जिसने डार्विन को बड़ी उलझन में डाल रखा था. उसने गालापोगोस द्वीपों पर देखा कि वहां तरह-तरह के पक्षी रहते हैं. किसी की चोंच छोटी और मोटी है, वह मेवों और बीजों पर जीता है, तो किसी की पतली और लंबी है और वह फूलों के भीतर दूर तक अपनी चोंच उतार कर रसपान करता है. उसे लगा कि इन सभी पक्षियों की पूर्वज कोई एक ही प्रजाति रही होनी चाहिये. उनके बीच सारे अंतर समय की देन हैं. डार्वन के समय डीएनए, जीन या क्रोमोसोम जैसे शब्द प्रचलन में नहीं थे*


*इस बीच वैज्ञानिक जानते हैं कि डीएनए को न केवल पढ़ा जा सकता है, बल्कि देखा भी जा सकता है कि जीवधारियों का रूप-रंग, आकार-प्रकार किस तरह बदलता है. जब भी कोई जीन सक्रिय होता है, वह कोषिका के भीतर अपने ढंग का कोई विशेष प्रोटीन पैदा करता है. उदाहरण के लिए यदि बीएमपी4 नाम के प्रोटीन को पैदा करने वाला जीन सक्रिय होता है, तो कुलिंग पक्षी की चोंच छोटी और चौड़ी बनेगी. लेकिन, यदि वह जीन सक्रिय होता है, जो काल्मोड्यूलीन नाम का प्रोटीन पैदा करता है, जिससे चोंच लंबी और पतली होगी*


*जीन का चक्कर:-*


*वैज्ञानिक अब यह भी जानते हैं कि विकासवाद जीनों में परिवर्तन से नहीं, बल्कि उनके सक्रिय या निष्क्रिय होने के बल पर चलता है. इसीलिए कोई ऐसा जीन भी नहीं होता, जो ठेठ मानवीय जीन कहा जा सके. हमारी हर कोषिका में करीब 21 हजार जीन होते हैं. करीब इतने ही चूहे में भी होते हैं. यानी नयी प्रजाति की उत्पत्ति के लिए प्रकृति को नए जीन नहीं पैदा करने पड़ते. नयी प्रजाति के लिए केवल सक्रिय और निष्क्रिय जीनों के बीच नया जोड़तोड़ काफी होता है*


*1995 में चिकित्सा विज्ञान की नोबेल पुरस्कार विजेता रही जर्मनी की क्रिस्टियाने न्युइसलाइन-फोलहार्ड इसी क्षेत्र में शोधकार्य कर रही हैं, "सबसे मूल गलती यह होती है कि लोग सोचते हैं कि यदि हम कुछ समझ गये हैं, तो उसे बदल भी सकते हैं. सच्चाई यह है कि यदि मुझे किसी आदमी की किसी विशेषता वाले किसी जीन का पता है, तो मैं उसे इतने भर से बदल नहीं सकती और मैं जीन-अंतरित कोई नया आदमी भी नहीं बना सकती. कर भी प्राणी बहुत ही जटिल संरचना होता है*



*1996 में डॉली की क्लोनिंग की गई:-*
*पहली क्लोन भेंड़ डॉली के जनक कहलाने वाले इयान विल्मट इसे नहीं मानेंगे. हालांकि इस बीच उन्होंने यह जरूर मान लिया है कि, उन्होंने नहीं, उनके साथी कीथ कैंपबेल ने 1996 में डॉली की क्लोनिंग की थी. अमेरिका के जीवरसायनज्ञ क्रैग वेंटर भी इसे नहीं मानेंगे. उनकी कंपनी सेलेरा जीनॉमिक्स ने मानवीय जीनोम को क्रमबद्ध किया था. भावी विकास के बारे में उनके विचार बहुत ही अफलातूनी हैं, "मेरी बात साइंस फिक्शन जैसी लग सकती है, लेकिन डिजाइन और जेनेटिकल सेलेक्शन अर्थात आनुवंशिक चयन भविष्य में डार्विन के विकासवाद की जगह लेंगे*


*यदि ऐसा होता भी है, तब भी इससे चार्ल्स डार्विन की 200 वर्षों से चल रही ख्याति की महानता कम नहीं होती*


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