पशु क्रूरता अधिनियम की धारा 28 को चुनौती; सुप्रीम कोर्ट बोला- 'पशुओं के जीवन की सुरक्षा भी संविधान के दायरे में'
- PIL का उद्देश्य: मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग।
- सुप्रीम कोर्ट का एक्शन: जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा।
- कानूनी चुनौती: पशु अत्याचार निवारण अधिनियम की 'धारा 28' को असंवैधानिक घोषित करने की अपील।
नई दिल्ली/कानपुर (NineOneTimes Desk):
देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने धर्म के नाम पर दी जाने वाली पशु बलि को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान होने वाली पशु बलि पर रोक क्यों नहीं लगाई जानी चाहिए?
क्या है याचिकाकर्ता की मांग?
वकील श्रुति बिस्ट द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि देश भर के कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर पशु बलि के नाम पर क्रूरता हो रही है, लेकिन प्रशासन इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। याचिका में मांग की गई है कि पशुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए 'पशु अत्याचार निवारण अधिनियम' में संशोधन किया जाए।
धारा 28 को चुनौती
खबर का सबसे तकनीकी पहलू पशु अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 28 है। वर्तमान में, यह धारा किसी भी धर्म की रीति के अनुसार पशु की हत्या को अपराध की श्रेणी से बाहर रखती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि 'जीवन के अधिकार' के दायरे में पशुओं की सुरक्षा भी शामिल है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। याचिका में सख्त कानून बनाने के साथ-साथ जनजागरूकता और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भागीदारी सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।
5. निष्कर्ष (Conclusion)
यह मामला धार्मिक मान्यताओं और पशु अधिकारों के बीच एक बड़ी कानूनी बहस छेड़ सकता है। अगली सुनवाई में केंद्र सरकार का रुख काफी महत्वपूर्ण होगा। इस मामले से जुड़ी हर पल की अपडेट के लिए NineOneTimes के साथ जुड़े रहें।


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