एक ही दिन में वरासत, उसी दिन बैनामा! 30 करोड़ का मालिक निकला सदर तहसील का 'शहंशाह' लेखपाल आलोक दुबे; मंडलायुक्त ने किया बर्खास्त, अब रसूखदारों की खैर नहीं!
कानपुर (विशेष संवाददाता): उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत कानपुर में एक बड़ी मछली पर गाज गिरी है। सदर तहसील में पिछले 29 सालों से एकछत्र राज करने वाले 'करोड़पति' लेखपाल आलोक दुबे को मंडलायुक्त (Commissioner) कोर्ट ने बर्खास्त कर दिया है। यह कार्रवाई उस भ्रष्टाचार के साम्राज्य पर की गई है, जिसकी नींव फर्जी दस्तावेजों और अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ पर टिकी थी।
30 करोड़ की संपत्ति और 41 बैनामे:
जाँच में जो सच सामने आया, उसने अधिकारियों के भी होश उड़ा दिए। आलोक दुबे और उनके परिवार के नाम पर 41 अचल संपत्तियां मिली हैं, जिनका बाज़ार मूल्य लगभग 30 करोड़ रुपये है। खेल इतना बड़ा था कि विवादित जमीनों पर एक ही दिन में वरासत दर्ज की जाती थी और उसी दिन उनका बैनामा किसी निजी कंपनी को कर दिया जाता था। लेखपाल ने अपने साथी लेखपाल अरुणा द्विवेदी के नाम पर भी 8.62 हेक्टेयर जमीन दर्ज कराई थी।
कैसे खुला पाप का घड़ा?
यह पूरा मामला 2 दिसंबर 2024 को तब उजागर हुआ, जब अधिवक्ता संदीप सिंह चंदेल ने जिलाधिकारी से सिंहपुर कछार में चार बीघा जमीन के फर्जीवाड़े की शिकायत की। डीएम जितेन्द्र प्रताप सिंह ने जब तीन सदस्यीय समिति से जाँच कराई, तो पता चला कि जिस जमीन पर कोर्ट में केस चल रहा था और खतौनी में नाम तक दर्ज नहीं था, आलोक दुबे ने रातों-रात उसकी वरासत और बैनामा अपने पक्ष में करा लिया।
सदर तहसील: रसूखदारों और 'अमर' लेखपालों का अड्डा!
आलोक दुबे महज एक उदाहरण है। कानपुर की सदर तहसील में अधिकारियों की मेहरबानी से भ्रष्टाचार का ऐसा जाल बुना गया है, जिसे भेदना नामुमकिन लगता है। आलोक दुबे 1995 से अधिकारियों से सांठ-गांठ करके संबद्धीकरण (Attachment) के खेल के जरिए सदर तहसील में जमा रहा। वह लेखपाल संघ का अध्यक्ष बनकर रसूख का इस्तेमाल करता रहा।
सावधान! अभी कई और 'आलोक दुबे' लाइन में हैं:
सदर तहसील का तैनाती रिकॉर्ड खंगाला जाए तो चौंकाने वाले सच सामने आएंगे। यहाँ कई ऐसे 'रसूखदार' लेखपाल हैं जो 30-30 सालों से एक ही तहसील में कुंडली मारकर बैठे हैं। समय-समय पर आने वाली स्थानांतरण सूची (Transfer List) में इन 'खास' लेखपालों का नाम कभी नहीं आता। अधिकारियों से इनकी सेटिंग इतनी तगड़ी है कि नियम-कानून इनके दरवाजे पर दम तोड़ देते हैं। आलोक दुबे की बर्खास्तगी के बाद अब तहसील में जमे उन अन्य 'मठाधीशों' में हड़कंप मच गया है जो करोड़ों की जमीनों के खिलाड़ी बने हुए हैं।


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