सुदर्शन ऋषि और डुमार, डोमार समाज: क्या नाम बदलने से बदली समाज की तकदीर? संजीव खुदशाह का एक विस्तृत विश्लेषण - NINE ONE TIMES

निर्भीक आवाज़, निष्पक्ष खबर

Breaking

30/03/2026

सुदर्शन ऋषि और डुमार, डोमार समाज: क्या नाम बदलने से बदली समाज की तकदीर? संजीव खुदशाह का एक विस्तृत विश्लेषण

NINE ONE TIMES

Sudarshan Rishi and Domar Samaj History Analysis by Sanjeev Khudshah Nine One Times



[विशेष आलेख: संजीव खुदशाह के विचारों पर आधारित | प्रस्तुति: न्यूज़ डेस्क, नाइन वन टाइम्स]

भूमिका:

भारतीय सामाजिक न्याय के इतिहास में जातियों का अपनी पहचान के लिए संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन डोमार (डुमार) समाज का संघर्ष अपनी जड़ों और अस्मिता को लेकर एक अलग ही कहानी बयां करता है। एक ऐसी जाति, जिसने अपनी सामाजिक गरिमा वापस पाने के लिए 'सुदर्शन समाज' के नाम का सहारा लिया, लेकिन आज वह समाज खुद को पहचान के दोराहे पर खड़ा पाता है। जाने-माने सामाजिक चिंतक संजीव खुदशाह के विश्लेषण के जरिए आइए समझते हैं कि इस समाज ने क्या खोया और क्या पाया।

जनगणना और पहचान का गहरा संकट

​पूरे भारत में डोमार जाति की सटीक जनसंख्या को लेकर आज भी कोई एकमत नहीं है। इसका मुख्य कारण जनगणना की प्रक्रियाओं में आने वाली विसंगतियां हैं। डोमार समाज के लोग अपनी जाति को लेकर एक स्पष्ट पहचान के बजाय अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम दर्ज कराते रहे हैं। कहीं वे खुद को 'भंगी-मेहतर' लिखवाते हैं, तो कहीं गर्व से 'जमादार' शब्द का प्रयोग करते हैं। इस विविधता के कारण सरकारी आंकड़ों में इनकी वास्तविक शक्ति का सही आकलन नहीं हो पाता। आज महाराष्ट्र के नागपुर, उत्तर प्रदेश के कानपुर और मध्य प्रदेश के जबलपुर जैसे बड़े शहरों में यह समाज लाखों की संख्या में निवास करता है, लेकिन कागजों पर इनका प्रतिनिधित्व वह नहीं है जो होना चाहिए।

सुदर्शन समाज का गठन: एक सकारात्मक प्रयास या सीमित दायरा?

​जब वाल्मीकि समाज ने वाल्मीकि ऋषि के नाम पर खुद को संगठित किया, तो उससे प्रेरणा लेकर डोमार समाज के कुछ बुद्धिजीवियों ने 'सुदर्शन समाज' के गठन का बीड़ा उठाया। उनके मन में विचार नेक थे:

  • ​समाज को 'मेहतर' और 'भंगी' जैसे अपमानजनक नामों से मुक्ति दिलाना।
  • ​समाज को धर्म और कर्म के मार्ग पर लाकर एक नई आध्यात्मिक पहचान देना।
  • ​जिस प्रकार वाल्मीकि नाम से जाति प्रमाण पत्र बनते हैं, वैसे ही 'सुदर्शन' नाम से कानूनी मान्यता दिलाना।

​इसके लिए करीब 27 समकक्ष जातियों को जोड़ने का बड़ा लक्ष्य रखा गया था। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि यह संगठन केवल डोमार जाति तक ही सिमट कर रह गया। अन्य जातियों ने इसे अपना प्रतिनिधित्व नहीं माना और धीरे-धीरे यह 'सुदर्शन' नाम केवल डोमार समाज की ही पहचान बनकर रह गया।

ऐतिहासिक पलायन: खेती-किसानी से सफाई कर्मचारी बनने तक की त्रासदी

​डोमार समाज का मूल इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। यह जाति मूल रूप से बुंदेलखंड और बघेलखंड की निवासी है। करीब 200 साल पहले जब उत्तर भारत में भीषण अकाल पड़ा, तो ये लोग दो जून की रोटी की तलाश में शहरों की ओर आए। अंग्रेजों के काल में जहाँ रेलवे लाइनों का काम चल रहा था या नए शहर बस रहे थे, वहां इन्हें जो काम मिला, वह इन्होंने किया।

​यहाँ यह समझना बहुत जरूरी है कि सफाई का काम इनका पुश्तैनी पेशा नहीं था। अपने मूल स्थान पर वे:

Sudarshan Rishi and Domar Samaj History Analysis by Sanjeev Khudshah Nine One Times


  1. ​खेती-किसानी करते थे।
  2. ​बांस के सुंदर सामान और बर्तन बनाते थे।
  3. ​जचकी (प्रसव) के लिए दाई का काम करती थीं।
  4. ​बैंड बजाने और धार्मिक कार्यों में मुखाग्नि देने का पवित्र काम करते थे। लेकिन शहरों की मजबूरी ने इन्हें सफाई कर्मचारी और मैला ढोने जैसे कार्यों में धकेल दिया, जिससे इनकी सामाजिक स्थिति गिरती चली गई।

कानूनी पेंच और जाति प्रमाण पत्र की उलझन

​समाज की एक बड़ी विडंबना यह है कि आज भी जाति प्रमाण पत्र बनवाने में बड़ी कठिनाई आती है। डोमार, डुमार का नाम अनुसूचित जाति की सूची में तो है, लेकिन कई जगह लोग आज भी 'मेहतर' या 'भंगी' के नाम से प्रमाण पत्र बनवाकर आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। वहीं 'मखियार' जैसी जातियां तो सूची में हैं ही नहीं, जिससे उनका वजूद खतरे में है। सुदर्शन नाम को अभी वह कानूनी दर्जा नहीं मिल पाया है जो समाज के नेताओं ने सोचा था।

मूल्यांकन: डोमार समाज ने क्या खोया और क्या पाया?

​संजीव खुदशाह का विश्लेषण एक कड़वी हकीकत की ओर इशारा करता है। वास्तविकता यह है कि सुदर्शन के नाम से सबसे ज्यादा नुकसान डोमार समाज को ही हुआ है:

  • आंबेडकरवादी आंदोलन से दूरी: सुदर्शन ऋषि की पहचान में उलझकर यह समाज डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के उस क्रांतिकारी आंदोलन से दूर हो गया, जो शिक्षा और राजनीतिक अधिकारों की बात करता था।
  • सीमित लक्ष्य: समाज के नेताओं का ध्यान केवल 'सफाई कामगार आयोग' के पदों तक ही सिमट गया है, जिससे समाज के युवाओं के लिए सिविल सेवा या उच्च शिक्षा के द्वार नहीं खुल पाए।
  • पहचान का भ्रम: उत्तर प्रदेश में हेला जैसी जातियां सुदर्शन आंदोलन से दूर रहीं, जिससे समाज की एकता कमजोर हुई।

निष्कर्ष और राह

​आज डोमार समाज को एक नए आत्म-चिंतन की आवश्यकता है। केवल नाम बदल लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को बदलना होगा जिसने उन्हें सफाई के काम से बांध रखा है। शिक्षा और नौकरियों में भागीदारी ही इस समाज की अगली पीढ़ी के भविष्य को संवार सकती है। सुदर्शन ऋषि के प्रति सम्मान के साथ-साथ आंबेडकरवादी चेतना को अपनाना ही इस समाज के लिए प्रगति का वास्तविक मार्ग होगा।


No comments:

Post a Comment

Featured Post

लखनऊ अग्निकांड में साजिश की बू! बेघर महिलाओं का बड़ा आरोप— "हादसा नहीं, साजिश थी यह आग; खाली कराने के लिए जानबूझकर लगाई गई"

NINE ONE TIMES झूठ फैला रहा मीडिया? झोपड़पट्टी की महिलाओं ने 'सिलेंडर ब्लास्ट' की थ्योरी को नकारा; कहा— "आग लगने के बाद फटे सिल...

खबर को दोस्तों के साथ शेयर करें:

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here

Pages