*☸️समुच्छेद☸️*      *बुराई की जड़ काटे।* - NINE ONE TIMES

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28/03/2020

 *☸️समुच्छेद☸️*      *बुराई की जड़ काटे।*

      
       



किसी गाँव में एक आदमी रहता था | उसके आँगन में एक पौधा उग आया। कुछ दिनों बाद वह पौधा बड़ा हो गया और उस पर फल आने शुरू हो गए। एक दिन एक फल पक कर नीचे गिरा। उस फल को एक कुत्ते ने मुँह में ले लिया। देखते देखते कुत्ते के प्राण निकल गए। लेकिन उस आदमी ने इस बात पर बहुत गौर नहीं किया। कुछ समय बाद पड़ोसी का लड़का उसके घर आया। बढ़िया फल देखकर उसका भी मन ललचाया। उसने एक फल तोड़ा और जैसे ही दाँत से काटा उसके भी प्राण निकल गए। अब उस आदमी को समझ आया कि यह विष-वृक्ष है।उसे बड़ा गुस्सा आया। उसने कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष के सारे फल काटकर गिरा दिए।लेकिन थोड़े दिन बाद पहले से भी अधिक बड़े फल फिर से लग गए। उसने दुबारा कुल्हाड़ी उठाई और एक-एक शाखा को काट डाला।  न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। उसने चैन की साँस ली। परंतु कुछ ही दिन बाद सारा पेड़ फिर से लहलहा उठा और फलों से लद गया। आदमी ने सिर पकड़ लिया।* 
*अब वह क्या करे? उसके पड़ोसी ने उसकी यह हालत देखी तो, उसके पास जाकर पूछा, क्या बात है? उस आदमी ने सारा हाल कह सुनाया। पड़ोसी ने कहा, तुम भोले हो। *तुमने फल तोड़कर फेंक दिए, शाखाएँ भी काट डाली। लेकिन जब तक जड़े बनी रहेगी, पेड़ भी बना रहेगा और फल आते रहेंगे। तब उस आदमी को समझ आयी कि बुराई ऊपरी काट-छाट से नहीं मिटती, उसकी जड़ काटनी चाहिए।*


*तथागत बुद्ध भली- भांति उदाहरण देकर गृहस्थ और गृहिनियों को भिक्षु और भिक्षुणियों को समझाते थे। बुद्ध ने भली- भांति अपने भीतर जो विकारों की जड़े है, जैसे राग, द्वेष, लोभ, क्रोध, भय, वासना, ईर्ष्या,अनेक प्रकार के जो विकार उत्पन्न होते है, उन्हें जड़ से समाप्त करने के लिए यह कल्याणकारी विपस्सना साधना विधि दी है। उसका अभ्यास करते हुए हम उन विकारों की जड़े समाप्त कर सकते हैं । उसके लिए विपस्सना का अभ्यास निरंतर करना होता है। अंधभक्ति, अंध विश्वास, जादू टोना, चमत्कार, मानसिक गुलामी इन सारी बातों से दूर रहना विपश्यना सिखाती है, अपने भीतर सुख, क्षांति, भय मुक्त होकर जीना सिखाती है। जीवन जीने की कला है, विपश्यना साधना।अनुभूति के स्तर पर केवल देखना है, सच्चाई के प्रति जागरूक रहना है, अनित्य स्वभाव के प्रति सचेत,अप्रमत रहना है। यही विपश्यना साधना का अभ्यास है। इस अभ्यास के द्वारा अंधेपन में उत्पन्न हुए सारे विकार सहज ही छूट जाते हैं*।
*"विष-वृक्ष" अपनी जड़ों से काट जाता है, समुच्छेद हो जाता है, यही सही दु:ख मुक्ति का मार्ग है।*


 


 


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