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02/03/2020

*इत्तिफ़ाक़ात-ए-ज़माना भी अजब हैं नासिर* (*:- नासिर काज़मी*)


*इत्तिफ़ाक़ात-ए-ज़माना भी अजब हैं नासिर* 
*आज   वो  देख   रहे   हैं  जो सुना करते   थे*
                                      
*:- नासिर काज़मी*


*जीवनी:*
     *सैयद नासिर रजा काज़मी आधुनिक युग के प्रसिद्ध उर्दू शायरों में से एक हैं. साथ ही वह एक पत्रकार और  लेखक भी थे. उनका जन्म 8 दिसंबर 1925 ई० को पंजाब के अंबाला शहर में हुआ था. आप के वालिद मुहम्मद सुल्तान काज़मी रॉयल इंडियन आर्मी में सूबेदार मेजर के ओहदे पर थे*


     *नासिर के वालिद के सरकारी मुलाज़िम होने की वजह से उनके तबादले होते रहते थे इसीलिए उनका बचपन कई शहरों में गुज़रा. प्रारंभिक शिक्षा शिमला से हासिल की*


      *मैट्रिक मुस्लिम हाई स्कूल अंबाला से करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए इस्लामिया कॉलेज लाहौर में दाखिला लिया. वहां आप एक हॉस्टल में रहते थे. उनके ख़ास उस्ताद रफ़ीक़ ख़ावर उनसे मिलने के लिए हॉस्टल में आते रहते थे, उनके कमरे में शेर ओ शायरी पर बात चीत होती. यहीं से उनके अंदर शेर ओ शायरी और अदब का शौक पैदा हुआ था*


     *1947 ई० में पाकिस्तान बनने के बाद आप लाहौर ही में बस गए थे. वहां बतौर एडिटर आप ने औराक़ ए नौ के लिए सहाफ़त का कुछ काम किया. फिर 1952 ई० में आप हुमायूं मैगज़ीन के एडिटर इन चीफ़ बन गए. बाद में आप रेडियो पाकिस्तान और दूसरे अदबी इदारों और पब्लिकेशंस के साथ जुड़ गए. आपका पसंदीदा शग़ल अपने दोस्तों के साथ पाक काफ़ी हाउस में बैठना और लाहौर की माल रोड पर टहलना था. आपको घूमने फिरने और खाने पीने का बहुत शौक था*


     *आप पाकिस्तान टेलीविज़न (पीटीवी), और अन्य टीवी शोज़ के साथ जुड़े रहे. भारत की बॉलीवुड फ़िल्मों में भी आपकी शायरी का इस्तेमाल किया गया.आपको अंतिम समय में पेट का कैंसर हो गया था और उसी वजह से 2 मार्च 1972 ई० को 46 साल की उम्र में आपका स्वर्गवास हो गया. लाहौर के मोमिन पुरा क़ब्रिस्तान में आपको दफ़न किया गया*


*काम :*
     *नासिर काज़मी को आधुनिक युग का मीर कहा जाता है. आप ने इंसानी जज़्बात को बहुत ख़ूबी से शायरी में ढाला है. अपनी 46 साल की ज़िन्दगी का ज़्यादातर हिस्सा आपने चाय ख़ानो, और रात की कहानियां सुनाती सुनसान सड़कों पर रतजगा करते हुए गुज़ारा है, उनकी बेहतरीन ग़ज़लें और नज़्में इन्हीं रतजगों का निचोड़ हैं*


     *आप विशेष रूप से अपने छोटे बहर (काव्य खंड) के लिए जाने जाते थे. नासिर रज़ा काज़मी ने अपनी कविता में सरल शब्दों जैसे चांद, रात, बरिश, मौसम, याद, तनहाई, दरिया आदि का प्रयोग करके एक नए अंदाज़ से अपनी शायरी को ज़िन्दगी दी. आप अपनी ग़मगीन शायरी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन आपने ज़्यादातर रोमांटिक शायरी ही लिखी है जो ख़ुशी और उम्मीद से भरपूर है. आप की चार किताबें आप की मौत के बाद छपी थी*


     *नासिर काज़मी एक सच्चे रचनाकार थे. वही लिखते थे जो दिल पर गुज़रती थी. नासिर काज़मी न सिर्फ शायर थे बल्कि शायर दिखाई भी देते थे. एक गहरी सोच और फ़िक्र हर वक़्त उनके चेहरे पर डेरा जमाए रहती थी. मुल्क के बंटवारे का भयानक मंज़र उनकी आंखों के सामने से गुज़रा. इसीलिए आपकी शायरी में कहीं कहीं बंटवारे का दर्द और चुभन भी नज़र आती है. बर्गे नौ (1952), दीवान (1972), पहली बारिश (1975), आपकी ग़ज़ल के संग्रह हैं जबकि निशाते ख़्वाब (1977) नज़्मों का संग्रह है*



*अहम ग़ज़लें :*
        🖋️ अब उन से और तकाज़ा...
        🖋️ आज तो बे सबब उदास...
        🖋️ फिर सावन रुत की पवन...
        🖋️ ना जाने आंखें ही बरसी ना...
        🖋️ सर में जब इश्क़ का सौदा...
        🖋️ नियत ए शौक भर ना...
        🖋️ क्या ज़माना था कि हम रोज़...
        🖋️ कल जिन्हें ज़िन्दगी थी रास...
        🖋️ ये शब ये ख़्याल व ख्वाब...
        🖋️ याद आता है रोज़ व शब...
        🖋️ ये रात तुम्हारी है चमकते...
        🖋️ हुस्न को दिल में छुपा कर...
        🖋️ तुम आ गए हो तो क्यों इंतजार...
        🖋️ तेरी जुल्फों के बिखरने का सबब...
        🖋️ वह दिल नवाज़ है लेकिन नज़र...
        🖋️ वह तेरे हुस्न की तस्वीर ग़ज़ल...
        🖋️ वह इस अदा से जो आए तो...
        🖋️ गिरफ़्ता दिल है बहुत आज...
        🖋️ सुनाता है कोई भूली कहानी...
        🖋️ दफ़ातन दिल में किसी याद...
        🖋️ ज़ुबां सुखन को सुखन बांकपन...
        🖋️ दयार ए दिल की रात में चिराग़...
        🖋️ वह सहिलों पे गाने वाले क्या...
        🖋️ देख मुहब्बत का दस्तूर...
        🖋️ होती है तेरी नाम से वहशत...
        🖋️ अव्वलीं चांद ने क्या बात सुझाई...
        🖋️ दौर ए फ़लक जब दोहराता है...
        🖋️ कौन इस राह से गुजरता...
        🖋️ दिल में एक लहर सी उठी...
        🖋️ आराईश ए ख्याल भी ही दिल...
        🖋️ ये भी क्या शाम ए मुलाक़ात आई...
        🖋️ अपनी धुन में रहता हूं...
        🖋️ कुछ यादगार ए शहर..
        🖋️ ये सितम और के हम फूल...
        🖋️ कोई सूरत आशना अपना...
        🖋️ इस से पहले कि बिछड़ जाएं...
        🖋️ बने बनाए हुए रास्तों पे जा...
        🖋️ मुसलसल बेकली दिल रही...
        🖋️ राह ए जुनूं में खुदा का हवाला...
        🖋️ दिल में और तो क्या रखा...
        🖋️ तू है या तेरा साया है...


नासिर काजमी 20 बेहतरीन शेर


नासिर काज़मी वर्तमान शायरों में वे फ़िराक़ के प्रशंसक थे और उनसे बेहद प्रभावित भी। अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए नासिर साहब ने ग़ज़ल को चुना और उसे अपना एक अलग रंग दिया। नासिर काज़मी ने ज़िन्दगी की छोटी-छोटी अनुभूतियों को ग़ज़ल का विषय बनाया और एक बढ़कर एक ग़ज़लें लिखीं। पेश है नासिर काज़मी के कुछ चुनिंदा शेर...

मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा
तमाम रात तेरे पहलुओं से आँच आई

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए
वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए


तारों का सफ़र ख़त्म हुआ


तन्हाइयां तुम्हारा पता पूछती रहीं
शब-भर तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

ये क्या कि एक तौर से गुज़रे तमाम उम्र
जी चाहता है अब कोई तेरे सिवा भी हो

देखते देखते तारों का सफ़र ख़त्म हुआ
सो गया चाँद मगर नींद न आई मुझ को

दिल डूबता जाता था इधर


धूप इधर ढलती थी दिल डूबता जाता था इधर
आज तक याद है वो शाम-ए-जुदाई मुझ को

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया

इस क़दर रोया हूँ तेरी याद में
आईने आँखों के धुँदले हो गए

कहां गईं वो सोहबतें


पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहां गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया

मय-ख़ाने का अफ़्सुर्दा माहौल तो यूँही रहना है
ख़ुश्क लबों की ख़ैर मनाओ कुछ न कहो बरसातों को

मुक़द्दर में नहीं तन्हाई


यूँ तो हर शख़्स अकेला है भरी दुनिया में
फिर भी हर दिल के मुक़द्दर में नहीं तन्हाई

डूबते चाँद पे रोई हैं हज़ारों आँखें
मैं तो रोया भी नहीं तुम को हँसी क्यूँ आई

यादों की जलती शबनम से, फूल सा मुखड़ा धोया होगा
मोती जैसी शक्ल बना कर, आईने को तकता होगा

दिल मुतमइन न था


तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था
गुज़री है मुझ पे ये भी क़यामत कभी कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी

गिरफ़्ता-दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने
ख़ुदा करे कोई तेरे सिवा न पहचाने

प्यारे रस्ता देख के चल


गली गली मिरी याद बिछी है प्यारे रस्ता देख के चल
मुझ से इतनी वहशत है तो मेरी हदों से दूर निकल

मैं रो रहा था मुक़द्दर की सख़्त राहों में
उड़ा के ले गए जादू तिरी नज़र के मुझे

जब पहले-पहल तुझे देखा था दिल कितने ज़ोर से धड़का था
वो लहर न फिर दिल में जागी वो वक़्त न लौट के फिर आया


                                                           ______नोट:-  नशा एक सामाजिक बुराई है इसका अनुसरण ना करें*   


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