पिता-बेटी की गजब कहानी एकसाथ बने लेखपाल, - NINE ONE TIMES

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04/01/2024

पिता-बेटी की गजब कहानी एकसाथ बने लेखपाल,

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सुल्तानपुर में पिता-पुत्री का एक साथ लेखपाल के पद पर चयन हुआ है। परिवार में दोहरी खुशी से हर कोई प्रसन्न है। पिता जहां सेना से रिटायर्ड होकर इस जॉब में गए हैं। वही बेटी ने पहले प्रयास में ही बाजी मारी है।

सुल्तानपुर: उत्तर प्रदेश में लेखपाल भर्ती का रिजल्ट आने के बाद सुल्तानपुर के एक परिवार में दोहरी खुशी दौड़ गई। लेखपाल के पद पर जहां सेना से रिटायर्ड पिता ने सफलता हासिल की, वहीं बेटी ने भी लेखपाल परीक्षा में पहले प्रयास में ही बाजी मारी ली। पिता-पुत्री का एक साथ लेखपाल के पद पर चयन होने से परिवार में दोहरी खुशी आई है।
बल्दीराय तहसील क्षेत्र निवासी है पिता-पुत्री
बल्दीराय तहसील क्षेत्र के पूरे जवाहर तिवारी गांव पिता व पुत्री निवासी हैं। रवींद्र त्रिपाठी कहते हैं कि देश सेवा के बाद अब समाजसेवा का भी मौका मिला है। इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद 19 साल की उम्र में रवींद्र ने पांच मार्च 1991 में सेना में भर्ती हुए। नौकरी में रहते हुए व्यक्तिगत आवेदन फार्म भरकर राणा प्रताप महाविद्यालय से 2004 में स्नातक की परीक्षा की उत्तीर्ण की। 
सेना में 28 साल की सेवा के बाद सूबेदार के पद से 2019 मेें रिटायर्ड हुए रवींद्र गांव नहीं लौटे। बेटी प्रिया त्रिपाठी व बेटा दीपेंद्र त्रिपाठी के साथ लखनऊ में बैंकिंग सेक्टर में जाने के लिए तैयारी करने में जुट गए। इस दौरान उन्होंने अपनी पुत्री के साथ एसबीआई पीओ की प्री परीक्षा पास कर ली लेकिन मेन्स में निराशा हाथ लगी। फिर 2021 में उत्तर प्रदेश पुलिस में उप निरीक्षक पद पर चयन हुआ। पीटीएस मुरादाबाद में ट्रेनिंग के लिए नियुक्ति पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों मिला।
पूरा परिवार खुशी से उछल पड़ा
वह बताते हैं कि परिवार के साथ रहने के चलते वहां ज्वाइनिंग नहीं किया। इस दौरान बेटा दीपेंद्र का चयन पोस्ट ऑफिस में हो गया। बीते शनिवार के देर शाम आए राजस्व लेखपाल के परीक्षा परिणाम में बेटी के साथ रवींद्र का भी नाम दिखा तो पूरा परिवार खुशी से उछल पड़ा। अब बेटी के साथ वे भी लेखपाल की नौकरी करेंगे।
मोबाइल को छोड़ किताबों से दोस्ती करें युवा'
रवींद्र का कहना है पहले देश सेवा किया है अब समाजसेवा करेंगे। उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि लगन व मेहनत से हम कोई भी मुकाम हासिल कर सकते हैं। युवाओं को मोबाइल की जगह किताबों से दोस्ती करने चाहिए।

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